बसन्त
बसन्त
1 min
590
बसन्ती हवाओं ने मौसम
को गुलाबी कर दिया
है घास में छोटे छोटे
फूल खिल चुके हैं
पौधों में नई पत्तियां आ चुकी हैं
ऋतुराज के आने की आहट
खेतों में फूली सरसों ने
पहले ही बता दी थी
गेंदा- गुलाब सब महक रहे हैं
औरतें राग गया रही हैं
बच्चे मुस्कुरा रहे हैं
मग़र जिंदगी मुझे झूठे दिलासा
दे रही है, धरती पर बसन्त बिखरा है
पतझड़ बस मेरे आंगन में है।
