भूल बैठा वो ज़ीस्त फ़ानी भी
भूल बैठा वो ज़ीस्त फ़ानी भी
1 min
250
बदज़ुबानी भी मेहरबानी भी
आइने सी तिरी जवानी भी
देख अपनो की बदगुमानी भी
भूल बैठा वो ज़ीस्त फ़ानी भी
इस मुहब्बत में है नशा इतना
खो न दूँ होश दरम्यानी भी।
आशियाँ को सवारने वाली
पुरअसर माँ की हुक्मरानी भी।
हौसले में भी मेरे पँख लगे
सब सुनेगे मेरी कहानी भी
ज़िन्दगी को संवारिये कितना
ज़िन्दगी आदमी की फ़ानी भी
ग़र हो मदहोशियाँ तो ऐ"आकिब'
ज़िन्दगी में हो सावधानी भी।
