बचपन
बचपन
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काश !
कोई लौटा दे मुझे बचपन के वो दिन
जहां चलता था एक बच्चा मां की उंगली पकड़
जो करता था शरारत दिन भर
कभी खिलौनों को तोड़कर
कभी घर के सामान को इधर-उधर छिपाकर
जिसमें दौड़ता था एक बच्चा बेफिक्र होकर
और खेलता था अपनी मासूमियत में
देखता था सपना घर की डहेलियो पर बैठकर
करता था दोस्तों से बातें
किसी बड़े समाजशास्त्री की तरह
और खुश होता था
अपनी छोटी छोटी ख्वाहिशों को मनवा कर
