अनुज्जल
अनुज्जल
गुजर जाते हैं खुबसूरत लम्हें, यूं ही मुसाफिरों की तरह
यादें बस उनकी रह जाती हैं ,यूं ही रूके ठहरे रास्तों की तरह !
इन दिल की हुई खंडहरों में ढूंढते रहते हैं यादें उनकी!
जो वक्त के पन्नों पर अपनी अमिट कहानी छोड़ गए!
उन यादों को मैं अपनी कविता का रंग देकर गुनगुनाता हूं।
प्रति क्षण प्रतिपल उनकी ससमित मुस्कान को समाने देख पाता हूं ।
काश कोई समयघड़ी होती जो हमें उसी पल में ,पलपल दिल के पास ले जाती !
काश वो सुनहले पल जिस पल को अपनी प्रेयसी की बाँहों में बिताया था ! वापस आ जाता !
काश वो रविवार जो मेरे सच्चे-अच्छे - नटखट दोस्तों के साथ बिताए गए वापस आ जाते !
कितना पीछे छूट गए न हम वक्त के रंगत में !
कितना जल्दी- जल्दी वो पल बीत गए पता भी न चला !!!
