"अनजाना सफर"
"अनजाना सफर"
1 min
283
वो शख्स वैसे तो अनजान था
पर वो भी जैसे पहचान का था,
लगा ही नही कुछ नया
जो इस मन ने सोचा था,
मिलती जुलती फितरत
अपनी,
ना कोई थोड़ी भी
उलझन थी,
साथ रहे या संयोग कहें
मन की एक सुलझन फिर थी,
क्या संयोग निराला था वो
न कोई झिझक न अनबन थी
बना रहे गर साथ हमेशा
वो अनजान नही
पहचाना सा था
