"अनजाना सफर"
"अनजाना सफर"
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वो शख्स वैसे तो अनजान था
पर वो भी जैसे पहचान का था,
लगा ही नही कुछ नया
जो इस मन ने सोचा था,
मिलती जुलती फितरत
अपनी,
ना कोई थोड़ी भी
उलझन थी,
साथ रहे या संयोग कहें
मन की एक सुलझन फिर थी,
क्या संयोग निराला था वो
न कोई झिझक न अनबन थी
बना रहे गर साथ हमेशा
वो अनजान नही
पहचाना सा था
