STORYMIRROR

saru pawar

Abstract

4  

saru pawar

Abstract

अंजान हूँ में...

अंजान हूँ में...

1 min
378

अंजान हूँ में अपनी ही चंद ख्वाँईशोसे अब तक      

हाँ चाहत है प्यार की परवाह भी है..            

मगर इस के बदले गवाना अपनी सोच को..       

अपने वजूद को मंजूर नही ..                  

अंजान हूँ के जरूरत मेरी है साथ तेरा 

तेरी हि शर्तोपर क्या ? 

                     

या तेरा साथ मंजूर है, खोकर अपना             

अस्तित्व कुछ अलग सा..


अंजान हूँ के अपने दायरे क्या है ?

है नासमझ बन देहलिजों में गुमनाम सा जिना       

या जरूरत के हिसाब से रिश्तों की              

अपनी अपनी अपने दायरों की लकिरों को चुनना

 

हूँ अंजान के सच्चे प्यार में क्या मिटजाना ही प्यार है?  

क्या वाकई अंधा होकर प्यार में जिना ही         

प्यार निभाने की शर्त है पेहली - और आखरी भी..              


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract