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कुमार जितेन्द्र जीत

Others

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कुमार जितेन्द्र जीत

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अंधेरे में इंसान

अंधेरे में इंसान

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स्वच्छ मन में , स्वार्थ और ईर्ष्या से !

आधुनिक इंसान में ,पनप रहा है अंधेरा !


पनपे रहे अंधेरे से, दरारे आ गई संबधों में !

प्रेम की परिभाषा अब , हो गई है कोसो दूर !!


दूरियाँ बढ़ने से , बदल रहा है सुन्दर सा तन ! 

चेहरे की मुस्कुराहट को , छीन गया अंधेरा !!


स्वच्छ मन में , स्वार्थ और ईर्ष्या से !

आधुनिक इंसान में ,पनप रहा है अंधेरा !


चंद पैसो की लालच में , हो रहा है बालश्रम !

अनमोल बचपन को , छीन रहा है बालश्रम!!


अज्ञान के आवरण में , फैल गया है अंधेरा !

मुस्कुराते बचपन को, छीन रहा है अंधेरा!!


स्वच्छ मन में , स्वार्थ और ईर्ष्या से !

आधुनिक इंसान में ,पनप रहा है अंधेरा !


शिक्षित लोग,कन्या के महत्व को समझ नहीं पाए! 

लड़के की चाहत में ,कर रहे है कन्या भ्रूण हत्या !!


शिक्षित होते हुए भी , छाया फैली है अंधेरा की !

धन्य है अनपढ़ लोग, नहीं कर रहे हैं भ्रुण हत्या !!


स्वच्छ मन में , स्वार्थ और ईर्ष्या से !

आधुनिक इंसान में ,पनप रहा है अंधेरा !


आधुनिकीकरण के चक्कर में , कट रहे है पेड़ !

अपने अस्तित्व को बचाने में , तरस रहे हैं पेड़ !!


अंधेरे के आवरण में,डूब गया है आधुनिक इंसान !

पर्यावरण संरक्षण को, नहीं समझ रहा है इंसान !!




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