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भाऊराव महंत

Others


4.5  

भाऊराव महंत

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अद्भुत है सौंदर्य तुम्हारा

अद्भुत है सौंदर्य तुम्हारा

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लगती हो तुम स्वर्ग परी-सी। 

देह तुम्हारी स्वर्ण खरी-सी। 

शक़्ल नारियल श्वेत गरी-सी। 

विद्युत है सौंदर्य तुम्हारा....!!


देख लगे तुम अजर-अमर हो। 

कौन कहेगा तुम नश्वर हो?

ख़त्म न हो वह संचित ज़र हो। 

अच्युत है सौंदर्य तुम्हारा.....!!


ऋचा सरीखी तुम वेदों की।

बनीं एकता तुम भेदों की।

शीर्षक तुम्हीं अनुच्छेदों की। 

श्रीयुत है सौंदर्य तुम्हारा....!!


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