चम्बल की ही प्रथा है मुझमें सदियों सहेजी व्यथा भी मुझमें! चम्बल की ही प्रथा है मुझमें सदियों सहेजी व्यथा भी मुझमें!
जून की भयंकर गर्मी में, पत्थर तोड़ रही थी नारी, चेहरे पर ना कोई शिकन! जून की भयंकर गर्मी में, पत्थर तोड़ रही थी नारी, चेहरे पर ना कोई शिकन!
यह हकीकत है दुनिया के एक सबसे बड़े लोकतंत्र की ! यह हकीकत है दुनिया के एक सबसे बड़े लोकतंत्र की !