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कपड़ा भी भेष बदलता है
कपड़ा भी भेष बदलता है
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© Ravikant Raut

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कपड़ा भी भेष बदलता है 

कपड़ा सही है , हिफ़ाज़त के लिये हो जब तक़ ,

गलत हो जाता है , गुलामी की वज़ह बनकर  

 मुर्दा मज़ारों ,

इबादत-ख़ानों की मरमरी दीवारों ,

          समाधी के पत्थरों  , अरे !!

चूमने की तुम्हें तो , रवायत है यहां ,

रब के बनाये ज़िन्दा किसी शाहकार को चूम लें तो ,

क्यूं हाहाकार होता है ॥

 

 

 

RAVIKANT RAUT.HINDI POETRY POEM CLOTHS

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