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अनुबन्ध
अनुबन्ध
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© Gantantra Ojaswi

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अनुबन्धों की धुंधली रेखा !

 

विधुजा बनकर तप्त हृदय पर

शीतलता का राग बुना था |

मनसिज सी कोमलता देकर,

स्वप्नों का आकाश चुना था..|

चिन्तन के उस पार बैठकर.

मैंने नभ को रोते देखा...

 

पथ में निर्लज कांटों ने मिल,

भेद दिया मन निर्ममता से |

आशाओं के फूल बिखेरे..

मसल दिये थे कायरता से |

उत्साहों से बढ़ते पग को..

बे-मन से तब हटते देखा..|

 

पथरीले पथ ऊँचे-ऊँचे,

विष्कण्टक  बोते थे अपने |

जब जब चाहा बढ़ जाऊँगा,

रोक रहे थे पग को सपने |

कोशिश करके कदम बढ़ाया

लांघ न पाया लक्ष्मण-रेखा...|

 

कहते थे सब राह सरल है,

चलकर देखा कठिन डगर थी |

अनुबन्धों के ढुलक मौज पर..

अभिशापों की बड़ी लहर थी |

मैंने 'मन के हारे' मन को..

उस मन से फिर लड़ते देखा..|

 

 

अनुबन्ध हमारे जीवनपथ

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