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मुहब्बत का सफ़र आसान  कब था ।
मुहब्बत का सफ़र आसान कब था ।
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© Ashok Goyal

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मुहब्बत का सफ़र आसान कब था । बिखरने का मुझे इम्कान कब था । मुझे मालूम थी औक़ात मेरी । मैं फ़ितरत से मेरी अनजान कब था । मुहब्बत में रहे हैं हम मुसलसल । किसी में ऐसा भी औसान कब था । लिखी अनफ़ास ये जिसने लहू में । हमारे जैसा वो इन्सान कब था । रिहाई जीते जी मुमकिन नहीं है । हमारे जिस्म सा ज़िन्दान कब था । मुझे खोये हुए मुददत हुई है । ख़बर क्या ,मैं तेरा महमान कब था ।

#मोहब्त #सफ़र

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