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Arya Jha

Children Stories


5.0  

Arya Jha

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वो तीन दिन......

वो तीन दिन......

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कह नहीं सकता कि कितने अजीब थे ये तीन दिन। पहले ही दिन बारह वर्ष पुराना प्यार लौट कर आया था। खुशी की बात यह थी कि वह भी अपने घर-परिवार में व्यस्त व प्रसन्न थी। मन पर से एक बोझ उतर गया था, पहले फिक्र रहती थी। उसके बारे में सोचने लगा कि कितनी शिद्दत से उसने मुझे ढूंढा होगा एक-एक कर नई पुरानी सारी बातें कर डाली। मन को मानो पंख मिल गए थे। मैं तो जैसे हवा में तैर रहा था। बार बार होठों पर वही गीत थे।

कितना मधुर कितना मधुर तेरा-मेरा प्यार 

लेना होगा जन्म हमें कई-कई बार....!

कैसे मिले, कैसे बिछड़े और फ़िर से कैसे मिल गए।

दूसरे दिन, पहले प्यार की खुमारी में खोया ऑफिस के फाइल्स निपटा रहा था कि पत्नी का फोन आया। एक बार को फोन उठाने का दिल ना किया। प्रेमिका के ख्यालों में हों और पत्नी का फोन आ जाए तो लगता है जैसे फ्रिज से मिठाई चुराकर खाता हुआ मम्मी द्वारा रंगे हाथों पकड़ लिया गया। पत्नी जी के बारे में अपने ख्याल कुछ ऐसे थे कि पहले पांच साल तो संगिनी रहीं पर जैसे-जैसे शादी पुरानी होती गई उनमें माता के दर्शन होने लगे।

अब शरारतें छूटती नहीं तो जनाब हमने डर-डर कर जीना गँवारा कर लिया। दुनिया डरती है तो मैं क्या अलबेला हूँ? और साहब महिलाओं की छठी ज्ञानेंद्रियों को आजमाने की कोशिश करना ही बेकार है। इनकी आँखों में धूल झोंकना आसान नहीं होता। श्रीमती जी ने सदैव ही मुझे शक के दायरे में रखा था। मेरी शैतानियाँ उनकी निगरानी में ही फल-फूल रहीं थीं। ऐसी ही अपनी शादी की गाड़ी चल रही थी। अब बसी बसाई गृहस्थी में पुरानी महबूबा का आगमन एक अच्छा संदेश था। एक दिन में ही जिंदगी से फिर से प्यार होने लगा था।


सफेद होते बाल रंगे गए। ऑफिस निकलने के पहले शीशे का दीदार कर जरा मुस्कुरा क्या लिया, पत्नीजी की शक की सूई मुझपर ही अटक गई। मुझे कनखियों से देखने लगीं थीं। अब सुबह से तीन फोन आ चुके थे । दो दिनों में ही जिंदगी की गाड़ी सेकंड गियर से फोर्थ गियर पकड़ चुकी थी। मैं फोन उठा कुछ मजाक करने ही वाला था कि उनकी भर्राई आवाज़ में अचानक घटित इस हादसे की खबर ने बुरी तरह से हिला कर रख दिया। हमारे बेहद नजदीकी मित्र 'मिस्टर नारायण' की असामयिक मृत्यु ने हमें घोर सदमें में डाल दिया। ये हमारे पुराने पड़ोसी थे। बेहद ज़िंदादिल इंसान थे और हमारी नई गृहस्थी के झगड़ों को सुलझाने व हम दोनों को लाइन पर लाने में उनकी अहम भूमिका थी।


हार्ट अटैक आया था। पत्नी द्वारा उनके मौत की खबर सुनते ही हाथ से फोन छूट कर टूट गया, पत्नी भावुक थीं। ऑफिस से सीधे मिसेज नारायण के पास पहुंच गईं और उनके घर ही रूक गई। मैं अन्य मित्रों के साथ उनकी अंत्येष्टि में शामिल हुआ। कुल तीन मित्रों का साथ मिला तो दिवंगत की अस्थियां विसर्जन करने के लिए हरिद्वार निकल गया। वापसी में मन बहुत व्याकुल था। पिछले दो दिनों में क्या कुछ नहीं घट गया था। प्रेमिका का मिलना, मित्र का खोना और फोन का टूटना, इन सारी घटनाओं ने जिंदगी में उथल-पुथल मचा कर रख दिया था।


आज सुबह के चार बजे घर लौट कर आया। मेड ने दरवाजा खोला तो सीधे बेडरूम में पहुँचा। मेरे तन-मन की पहरेदार बेसुध पड़ी थी। उसे क्या पता कि मेरे मन पर डाका पड़ चुका था। अपनी मासूम पत्नी को सोता हुआ देख अपने आप पर बेहद ग्लानि होने लगी थी। आखिर थानेदार भी तो इंसान ही हुआ करते हैं। जगी रहने पर कड़क मूड की स्वामिनी इस वक़्त मेरी मनःस्थिति से अनजान एक भोली-भाली गुड़िया सी दिख रही थी। एक कप कॉफी के साथ बालकनी में आकर बैठ गया। इतनी भागदौड़ के बाद आज तन्हा था। वह जिससे पुराना नाता था जो गाहे-बगाहे ख्यालों में आकर सताती थी और अब जबकि सचमुच आ गई तो मन बिल्कुल शांत पड़ गया था।

कैसे लोग किसी और के लिए अपनी पत्नी को दुखी करते हैं। मेरे साथ उल्टा ही हो रहा था। आज की भोर मेरे जीवन की सबसे खूबसूरत भोर थी। "ऑफिस नहीं जाना? उठ जाओ जल्दी!" मैडम को जगाया।

"मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती आदित्य! मुझे छोड़ कर नहीं जाओगे ना?" बोलती हुई सीने से चिपक गई। ताजा-तरीन दुर्घटना का असर था।

"नो बेबी! नेवर!" कह कर उन्हें गले लगा लिया।

"फोन कैसे टूटा?" आँख खुलते ही मोहतरमा ने आँखें दिखायी तो मैंने झट रौंग नम्बर का बहाना बनाया। उस हादसे का जिक्र कर दुखी नहीं करना चाहता था। उसके बालों को सहलाते हुआ सोचने लगा कि मेरे परिवार की खुशियों के बीच रौंग नम्बर वो ही तो है पर उसके प्रवेश का मुझ पर बड़ा राईट असर हुआ। मेरे अतीत के लौटने से मेरी शादी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। मेरा फ्रस्ट्रेशन जाता रहा। आजतक बीवी मुझे अपने प्रेम के घेरे में कैद रखना चाहती थी और मैं इस बात से बुरी तरह चिढ़ता था फिर आज क्यों उसका प्रेम कैदी बना स्वयं आत्मसमर्पण करने आ पहुँचा था। मैं सदा के लिए उसके पास लौट आया था। समझ में आ गया था कि प्रेम में संकीर्णता एक छोटी सोच है।

एक माँ बस पहले ही नहीं बल्कि दूसरे बच्चे पर भी उतनी ही ममता लुटाती है। अपने बच्चों में भेद कहाँ कर पाती है। सबको अपने हिस्से का स्नेह मिलता है। विवाह में असुरक्षा के भाव के कारण ही बेचैन हो कर लोग बवाल करते हैं। ऐसे लोगों को कहाँ खबर है कि इससे मजबूत कोई और संस्था है ही नहीं? ऑफिस पहुँच कर अपनी मैडम एक्स को फोन कर सूचना दी कि, "तुम्हारे लौटने से ही मैं जान पाया कि मैं अपनी पत्नी से बेइन्तहा मोहब्बत करता हूँ। इस बात का अहसास कराने के लिए तुम्हारा शुक्रिया। और हाँ! दुनिया के लिए हम एक-दूसरे के अच्छे मित्र के सिवा कुछ भी नहीं!"

"तुम बेहतरीन इंसान हो आदि। मुझे तुम पर और तुम्हारी दोस्ती पर गर्व है! जाओ, खुश रहो! इस जन्म में ही नहीं बल्कि हर जन्म में मेरे दोस्त बनना। वादा करो बनोगे ना!"

"वादा किया। बनूँगा!"

जाने कैैसे लोग सालों तक घर-बाहर के तमाम रिश्ते निभा लेते हैं। यहाँ तीसरे दिन ही मेरे अंदर-बाहर की सारी कोलाहल शांत हो गई थी।


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