सीमाओं से परे रिश्ते
सीमाओं से परे रिश्ते
जब हम जन्म लेते हैं तो हम अनेक रिश्तों में बंँधकर जीवन जीना शुरु करते हैं। बचपन से लेकर, वृद्धावस्था के हर पड़ाव से गुज़रते हुए रिश्तों के इन्द्रधँनुषी रंगो को समेट कर, हम जीवन के सफर पर निकल पड़ते हैं। जीवन की निरन्तर चलने वाली यात्रा में मनुष्य जीवन अनमोल हैं। प्रेम, घृणा, छल, कपट, परोपकार और मानवता का रिश्ता जिस भी रंगो मे रंगना चाहेंगे उसी में रंग जायेंगे। अब हम पर निर्भर हैं कि हम रिश्तों को कैसा आकार देना चाहते हैं। नि:स्वार्थ चुने गये रिश्तों से हम उल्लासित होगेऔर स्वार्थ में फंँसे रिश्ते हमें
सुख चैन नहीं दे सकते हैं सिर्फ दुःख के बादल ही दे सकते हैं और कुछ नहीं।
रिश्ते सिर्फ हम घर परिवार और अपनों के साथ ही नहीं निभाते हैं बल्कि
कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जो नहीं चाहते हुए भी बन जाते हैं और हम उनको प्रेम वश और नि:स्वार्थ होकर निभाते हैं।
जिनका कोई नाम नहीं बस कह सकते हैं कि ये रिश्ते मानवता के हैं। और अनकहे है।जिनको निभाकर हम आत्मिक सुख का अनुभव करते है।
कहा जाता है कि मानव योनि बहुत मुश्किल से मिलती है
यदि परमात्मा ने जीवन दिया हैं तो उसे अच्छे कार्य मे लगाकर जीवन में अपने रिश्तों से सुख का अनुभव करो जब अच्छा करोगे तो रिश्ते भी क्यों खराब होगें।
ऐसा ही एक रिश्ता ना चाहते हुए भी जो सभी सीमाओं से परे हैं आज मैं निभा रही हूँ और आत्मिक सुख महसूस कर रही हूँ।
प्रात: जल्दी उठकर नियम से दो गिलास गुनगुना पानी पीकर, नित्य कर्म से निवृत होकर, छत पर भगवान भास्कर की स्तुति और जल अर्पण करना ! मैं जैसे ही छत के दरवाजे खोलती, मेरे ऊपर आने तक दो आँखे मुझे देख रही होती ! म्याऊँ की आवाज मेरे कानों में पड़ती और मैं भी हमेशा उसको अनदेखा सा कर आगे बढ़ जाती और वो कुछ खाने की उम्मीद में मेरे पीछे लगी रहती। मैं उसको भगाती, "जाओ यहाँ से "!।पास ही कही छिपकर बैठ जाती, कभी दीवार फांदकर पडोसियों की छत पर जा बैठती जब कभी वो मुझे दिखायी नहीं देती, तब मेरी आँखे उसे तलाशती "कहाँ हों "? एक रिश्ता जो बन गया था।
मैं जब पंक्षियों को दाना डालती वो दूर से ही देख रही होती।
मेरे मन में हमेशा डर और दुविधा बनी रहती थी कि कही ये इन पंक्षियों का शिकार ना कर ले।
हमेशा दाना और रोटी डाल कर, मैं उनकी चौकसी कर रही होती।कुछ दाना खाते, कुछ गिराते और कुछ वही मुडेर पर छोड़ जाते, जिसे मैं शाम तक पड़ा हुआ देखती थी।
पर जो पड़ा हुआ होता था मैं उसे अक्सर म्याऊँ को खाते देखती थी, मुझे बहुत हैरानी भी होती कि ये चाहे तो मुडेर पर चढकर सारा दाना और रोटी खा सकती है पर एेसा कभी नहीं हुआ।
मैंने उस को कभी मुडेर पर चढकर खाते नहीं देखा उसने भी शायद उसी खाने से संतोष करना सीख लिया था। मन से मैं भी चाहती थी कि वो भी खा ले। रोटी ज्यादा रखने लगी थी।
हमेशा काम वाली बाई मुझसे शिकायत करती "भाभी इसको भगाया करो देखो गंदा कर जाती है "और पतिदेव को भी मेरा पशु पक्षी के प्रति प्रेम भाता नहीं था, कहते देखो ये तुम्हारा पशु पक्षी प्रेम बाहर तक ही सीमित रहे, घर के अन्दर नहीं आना चाहिए।
बस यही सोच मैं उसको रोटी देने से कतराती कि कही ज्यादा ही उम्मीद कर ये घर के अन्दर तक न आ जाये। मैं भी नहीं चाहती थी कि वो अन्दर आये, रसोई में बर्तन झूठे करे, और बिस्तर पर बैठे क्योंकि भगवान ने स्वभाव से उसको एेसा ही बनाया हैं। एक दो बार मेरे पीछे आयी भी मेरे भगाने पर वो भी जान गयी थी जैसे ।
ऊपर ही रहती नीचे कभी नहीं आती।
अभी तीन दिनो पहले ही कि बात है।आकाश मे बादल छाए हुए थे बादल गरज रहे थे और तेज हवा के साथ बिजली कड़क रही थी।
सुबह मौसम मे ठंडक थी।छत पर हल्की फूहारें पड़ रही थी मन बहुत ही आनन्दित हो रहा था।पंछी चहक रहे थे। मैं अपने व्यायाम करने को जैसे ही चटाई उठाने लगी, जिस पेटी में सामान आया था। जिसको मैंने काम वाली बाई से ये कह कर कि इसे नीचे पार्किग में रख आना, उसने उसे अभी तक वही रख छोड़ा था, वो वही गिरी हुई थी। उसमें रखे कागज बारिश में भीगे हुए बिखरे थे, उनको समेट जैसे ही पेटी उठाने लगी, उसमें से झाँकती दो आँखे मुझे दिखायी पड़ी।
"ओह तो अब समझी आज तुम यहाँ बैठी हो, देखकर मन ही मन बुदबुदायी। उसको भगाने लगी तो नहीं ही भागी। मैंने सोचा चलो बारिश से बचकर यही बैठी है कोई बात नहीं, मैं अपने काम में लग गयी, दोपहर में गयी वो वही बैठी मिली, जब शाम को देखा वही थी।
कुछ समय पहले उस के शरीर के बढते आकार को देख समझ गयी थी।जल्दी ही नये रिश्ते मे बँधने वाली है वो माँ बनने वाली है।
अब वो थोड़ी सुस्त रहती थी।
दूसरे दिन जब ऊपर गयी तो मुझे पेटी मे झॉकते देख वो थोड़ी आतंकित सी लगी।मुझे देखता देख गुर्राने लगी। ध्यान से देखा तो कुछ हिलता सा लगा।मन बहुत ही खुशी से भर उठा जब देखा वहा पर चार छोटे- छोटे नव जीवन उस की गोदी मे हिल रहे थे। अभी आँख भी बन्द थी।मुख मे आवाज भी नहीं थी।
खुशी से सब को बताया। बेटे को फोन कर बताया।खुश हो बोला "माँ तुम तो जगत मैया हो अब उन को खिला पिला कर खुब तगड़ा कर देना"।उस के लिए दूध ,रोटी और गुड़ रखा।
मेरे रहते उसने नहीं खाया जब बाद मे देखा सब खा लिया था। मैं अनजान अनकहे रिश्ते मे बंधी। तीन दिनों से उसकी सेवा में लगी हूँ और वो उस समय जो मुझे देख डर रही थी।कही मैं उसके बच्चों को कुछ नुकसान ना पहुंचा दूँ।आखिर माँ जो ठहरी !अब आश्वस्त है। मेरे पास जाने से आतंकित नहीं हो रही।
और मैं भी बहुत प्रसन्न हूँ, नन्हे मेहमानों की आवाज सुन।
दुनिया का सबसे पहला रिश्ता मानव आदर्श मुल्यो की स्थापना करना है।जो सभी रिश्तो की सीमा से परे है।
