सादा जीवन
सादा जीवन
हर देश, हर शहर और गाँव की संस्कृति अलग अलग होती है लेकिन भारतीय संस्कृति पूरे विश्व में अजोड़ है।
गाँव में लोग धार्मिक और सरल होते हैं, मेहनती और हेलधी होते हैं, भाईचारा से मिलजुलकर जीवन व्यतीत करते हैं, अपने घर में भैंस या गाय के दूध को एक दूसरे से देकर खुश होते हैं, धार्मिक त्योहार सभी जाती के लोग बड़ी खुशी के साथ मनाते हैं।
हमारे गाँव में हर साल गाँव को चारों ओर से सूत के धागे से लिपटा जाता है, एक आदमी सूत कलश में पानी के अंदर रखकर चलता है, दूसरा आदमी आगे आगे चलता है और रास्ता साफ करता है, एक आदमी ढोलक बजाता है और पूरे गाँव को एक सूत से रक्षा कवच देने के लिए ये रस्म अपनाया जाता है।
गाँव में प्रवेश द्वार पर मंदिर होता है लोग दर्शन कर के अपने अपने खेत में काम करने के लिए जाते हैं, सुबह और शाम को आरती होती है, गाँव के बुजुर्ग लोग शाम चौराहे पर इकठ्ठे होकर बैठते हैं और अपनी अपनी बात करते हैं। लोग सुबह उठकर टूथ पेस्ट के बजाय बबूल की डाली को तोड़कर दातुन करते हैं, पहले के समय में टूथ पेस्ट या टूथ ब्रश नहीं थे फिर भी लोगो के दाँत साफ और सुंदर होते थे। गाँव में पाठशाला, अस्पताल, मंदिर, गौशाला होती है, सुबह से ही चरवाहा अपनी गाय भैंस को चारा खिलाने जंगल में लेकर जाते हैं और शाम को दूध के लिए घर लौट आते हैं।
गाँव में होली का त्योहार बड़ी खुशी से मनाया जाता है, लोग जलाइया बनाकर होली मे लकड़ी के साथ जलाते हैं और पूजा करते हैं और दूसरे दिन रंगों से खेला जाता है, रंग पूरा हो जाने के बाद पानी से और मिट्टी से होली खेलते हैं, लोग एक दूसरे को तालाब में भी पकड़ कर डाल देते हैं। गाँव में लुहार होता है वो लोहे के शस्त्र खेती के लिए तैयार करता है, सुथरा लकड़े के हल तैयार करता है और चमार लोग चमड़े की रस्सी बैलों के लिए तैयार करता है, किसान के लिए चप्पल चमड़े की तैयार करता है, कुएँ से पानी निकाल ने के लिए चमड़े का कोष याने कि पानी निकाल ने का साधन तैयार करता था। लेकिन आज यंत्र आने के कारण उन लोगो को कोई याद नहीं करता है, पहले के समय में यही लोग समाज के लिए खास तौर पर मदद करते थे, बुनकर कपड़े तैयार करते थे।
पहले के समय में नाचगान या सिनेमा नहीं थे इस लिए नायक और तूरी लोग राम लीला और प्रादेशिक कहानी पर आधारित नाटक खेलते थे, लोगों का मनोरंजन कराते थे, गाँव की संस्कृति आज भी दूर दराज़ के इलाकों में याने की गाँव में दिखाई देती है, गाँव का जीवन सरल और सहज था, गाँव में ताज़ा सब्जी और दूध उपलब्ध होता है, वातावरण शांत होता है, ताजी हवा मिलती है। गाँव में संस्कृति हैं की गाँव में कोई आदमी को मुसीबत आती है तो सभी लोग उसे मदद करते हैं, कोई भूखा नहीं सोता है, गाँव में पशु पालन का व्यवसाय होता है, गाँव के लोग दयालु होते हैं, पहले के समय में गाँव में एक मुखिया होता था, वो सब को न्याय दिलाने का प्रयास करता था, किसी को कोई बात की मुश्किल हुई हो, या फिर किसी ने अपने साथ अन्याय किया हो तो मुखिया को बात बताई जाती थी, मुखिया उसे न्याय देता है, लोग मुखिया की बात मानते थे।
गाँव में पुरुष और महिला दोनो काम करते हैं, कोई खेत में काम करता है तो कोई पशु पालन का व्यवसाय करते हैं, ज्यादातर मकान मिट्टी से बने हुए होते थे, छत पर मिट्टी के खपीएड़े या फिर घास से ढके हुए होते थे लेकिन आज सीमेंट की छत से बने हुए पक्के मकान देखने को मिलता है, आज गाँव शहर की ओर जा रहा है, शहर जैसी सुविधाएँ गाँवों में होने लगी है, घरों में लोग ए सी, टेलीविजन, चैनल और कीमती सामान बसाने लगे हैं, लोग साइकिल के बजाय मोटर साइकिल और लक्जरी कारों के साथ जीवन बिता रहे हैं, लोगों को खेत में काम करना अच्छा नहीं लगता है। इस लिए अपनी ज़मीन बेचकर धंधे में पैसे डाल रहे हैं, आज के गाँव ने शहर का स्वरूप धारण कर लिया है।
