फिर से हुई दोस्ती
फिर से हुई दोस्ती
निधि अपनी नानी के घर गर्मी की छुट्टियाँ बिताने आई थी। नानी के घर में मामा-मामी, मौसी, नानीजी और ममेरी बहन रितु थी। निधि और रितु का सुबह कब होती और कब रात बीत जाती पता ही नहीं लगता। पूरा दिन ढेरों बातें बनाना, अपने–अपने स्कूल कौर दोस्तों के किस्से सुनती। दोनों खेलने में इतनी व्यस्त रहती की खाने-पीने की सुध ही न रहती। मामा मामी कभी लाड़ –प्यार से तो कभी डांट डपट के खाना खिलाते। रात में भी सबके सोने के बाद चुपचाप खुसर-फुसर करती।
निधि को नानी के घर आए कई दिन बीत गए थे। निधि को सिर्फ रितु ही नहीं बल्कि नानी के घर पर उसे सभी प्यार करते, उसी के साथ खाना खाते, लूडो खेलते, घूमने जाते, बाजार ले जाते तथा नाना-नानी उसे अच्छी-अच्छी कहानियाँ भी सुनाते। घर के सभी लोग रितु से ज्यादा निधि पर ध्यान देने लगे। घरवालों का प्यार कुछ कम होता देख रितु को मन टूटने लगा। रितु को निधि का आना एक-दो दिन के लिए ही अच्छा लगा मगर धीरे-धीरे उसे निधि से घृणा होने लगी। रितु को लगने लगा कि निधि ने उसका सारा प्यार छीन लिया है। वह अपने मन में विभिन्न तरह के विचार लाती और सोचती कि क्या किया जाए। जिससे मम्मी-पापा, दादा-दादी, बुआ फिर से मुझसे प्यार करने लग जाए।
निधि के प्रति रितु का व्यवहार भी कुछ विचित्र सा हो गया था। रितु के व्यवहार के कारण निधि भी कुछ उदास हो गई थी मगर अपने मन की बात किसी से कहने से उसे डर लग रहा था। सभी तो उससे प्यार करते हैं बस यही सोच कर चुप हो गई। इधर रितु ने निधि के विपक्ष में एक योजना बनाई और घर के सभी सदस्यों और आसपास के मित्रों से निधि की बुराई करनी शुरू कर दी तथा ऐसी-ऐसी मन घड़ंत अफवाहें फैलानी शुरू कर दी। जिनका कोई वजूद ही नहीं था, लेकिन जब सबको इस सच्चाई का बोध हुआ तो सबने निधि से माफी मांगी और रितु की इस हरकत पर सबने उसके प्रति निंदा व्यक्त की। निधि के मामा - मामी और मौसी ने रितु को डांटा और उससे बोलना बंद कर दिया। इतना ही नहीं बल्कि आसपास के मित्रों ने भी वैसा ही किया। अब उसे अपनी गलती का एहसास हो गया था। उसने सब से माफी मांगी। मगर अभी भी सब नाराज ही थे।
रितु रोते-रोते अपनी दादी के पास गई । दादी ने पूछा, "क्या हुआ रितु ? क्यों रो रही हो ?"
उसने सब कुछ विस्तार से दादी को बता दिया। दादी मुझे अपनी गलती का पछतावा हो गया है, मगर सब अभी भी नाराज है। दादी ने रितु से कहा, "तुम वैसा ही करो जैसा मैं तुमसे कहूँ रितु।"
रितु ने दादी को पूरा आश्वासन देते हुए कहा, “ठीक है मैं वैसा ही करूंगी जैसा आप कहेंगी।“
दादी ने रितु से कहा, "तुम थोड़े से फूल लो और उन फूलों को अपने घर से चौराहे तक एक-एक करके सड़क पर रखती जाना । रितु को कुछ अटपटा लगा मगर उसने दादी से वादा किया था इसलिए उसने वैसा ही किया।
अगले दिन दादी ने रितु से कहा, "अब तुम उन फूलों को सड़क से उठाकर ले आओ।" रितु वहाँ जाती है और उसे हैरानी होती है। वह सोचती है कि कल उसने रास्ते पर बहुत से फूल रखे थे मगर आज उसे सिर्फ चार-पांच फूल ही मिले हैं। रितु दौड़ी-दौड़ी दादी के पास जाती है और कहती है कि मैंने कल रास्ते पर काफी फूलों को कतार में रखा था मगर आज मुझे तो सिर्फ चार-पांच फूल ही मिले ऐसा क्यों दादी ?
दादी रितु से कहती है, "हमारी जिंदगी भी इन फूलों की तरह है, तुमने निधि के लिए काफी अफवाह फैलाई थी। अफवाएँ फैलाना आसान होता है या किसी को बदनाम करना भी आसान है, लेकिन कमान से तीर और मुंह से निकली बात वापस नहीं आती। इस तरह की बातों और उपद्रवों से हमारे हाथ कुछ नहीं आता। बल्कि शर्मिंदगी उठानी पड़ती है और हँसी का पात्र बनना पड़ता है।
अब रितु को अपनी गलती का वास्तविक एहसास हो गया था इसलिए वह निधि से घर के सभी सदस्यों के समक्ष माफी मांगती है और फिर से ऐसी गलती न करने का वादा करती है।
दादी द्वारा दी गई सही सीख और रितु के प्रायश्चित ने उन दोनों के दिलों की गलतफहमी को दूर कर दिया I दादी की सूझबूझ के कारण रितु और निधि दोनों में एक बार फिर से दोस्ती हो जाती है।
