पगली
पगली
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वह दिन भर बक बक करती टहलती रहती। कभी छत पर कभी सडकों पर, हम मन ही मन सोचते कि इसका इलाज काहे नहीं कराते।
ढेर सारे बाल गोपालों की माँ थी वह। बड़ी वेदना थी उसके जीवन में। जब कभी गंभीर रूप से बीमार हो जाती तो उसको पीटा जाता, जला दिया जाता।
फिर भी उसका पति उसके साथ सोना नहीं भूलता। धीरे धीरे वह बहुत ही खराब हालत में पहुँच गयी और मार पीट का सिलसिला जारी रहा, अब तो बेटा भी पीटता था।
एक दिन मर गयी सब लोग रो रहे पति भी रो रहा था वाह रे ढकोसला। पंडित खिलाये गये, पर पगली असमान से देखकर हँस रही थी और कह रही थी वाह रे समाज।
