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Jhilmil Sitara

Others

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Jhilmil Sitara

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माटी का शरीर

माटी का शरीर

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" पांचो अपने दो बेटों के साथ जिनकी उम्र महज़ दस और सात की थी लेकर मायके जा रही है। उसका मायका झारखंड राज्य के एक पिछड़े गांव में पड़ता है। जहां आज भी बिजली नहीं है और ना ही पक्की सड़कें हैं। बस से उतरकर उसे आगे तीन किलोमीटर पैदल ही चलना होगा। 


मई महीने की तेज गर्मी और झुलसाने वाली धूप होने के बावजूद पांचो अपने दोनों बेटों के साथ कच्ची सड़क पर चली जा रही है। हाथ में एक कपड़े का थैला है जिसमें कुछ जोड़ी कपड़े हैं।‌ दूसरे हाथ से अपना आंचल सर पर ओढ़कर कोना पकड़ रखा था पांचो ने। लू लहर से उड़ती धूल आंखों को आगे का रास्ता देखने में भी बाधा पहुंचा रहे थे। शाम ढ़लने में अभी कुछ समय बाकी था। 


बच्चों के पीछे चलते हुए पांचो लू लहर और गर्मी से परे विचारों में डूबी हुई थी। कुछ महीने पहले भी वह मायके आई थी, तब पांचो के पति जीवित थे। तब वह सुहागनों की तरह इतराती हुई सजी संवरी, हंसती - खिलखिलाती हुई आई थी। और आज नियति का लेखा बदल गया है, वह अपने ही ससुराल को छोड़कर मायके जा रही है बहुत भारी मन से। शायद फिर वह लौटकर ना जा पाए अपने ससुराल या खुद लौटने का मन हौसला ही ना जुटा पाए उस दहलीज़ पर जहां से उसकी जेठानी ने मुफ्तखोर , कामचोर और ना जाने क्या - क्या कहकर अपमानित किया था महीनों तक। 

अचानक बड़े बेटे की चप्पल टूट गई। पांचो ने उसे अपना चप्पल पहना दिया और टूटी चप्पल को हाथ में उठाकर चलने लगी। वह उसे घर पर सुई से सीलकर पहनने लायक बना लेगी। आखिर अब पति तो है नहीं जो नई लाकर अगले ही दिन दे देंगें। जाते जाते मायके वालों से फरमाइश करना भी ठीक नहीं लगेगा। वैसे भी पांचो नहीं जानती वह आगे अपने बच्चों का पालन - पोषण कैसे करेगी। कमाने का कोई जरिया नहीं है उसके पास । पिता और भाई भी खेतिहर मजदूर हैं, वह भी अपनी मां और भाभी केे साथ घर‌ के कामों‌ के बाद खेतों में जाया करेगी जिससे दो पैसे अधिक कमा सकेगी बोझ बनकर रहने जैसी अनुभूति नहीं होगी। 


अपने मायके और ससुराल में पहले कभी उसने खेतों में काम नहीं किया था। घर का ही पूरा काम अच्छी तरह सम्भालती थी। लेकिन, अब हालात बिल्कुल बदल गए हैं। बात अब सिर्फ एक उसकी नहीं रह गई है। बात अब बच्चों की परवरिश की है। 


इसी उधेड़बुन में चलती जा रही थी पांचो। ना गर्मी और ना पसीना उसे महसूस हो रहे थे ना नंगे पैरों में चुभते हुए कंकड़ पत्थर। पानी की मांग करता हुआ बेटा अचानक सामने आकर खड़ा हो जाता है। गांव के ठीक बाहर एक कुआं है, वहां तक सब्र करने के लिए कहकर पांचो उसका पसीना अपने पल्लू से पोंछती है। बच्चों का चेहरा धूप से झुलसा हुआ और होंठ सूखे हुए थे। आज पहली बार था जब वह बच्चों का हाथ पकड़कर इस तरह निकल आई थी। इसके पहले अपने पति के साथ आटोरिक्शा पर सवार होकर सुबह ही आ जाती थी। बच्चों का ऐसा हाल उसे और अधिक रूला रहा था। रह रहकर वह कोस रही थी अपने पति को। 


पांचो के पति पंजाब के एक कपड़ा मील में काम करते थे और अच्छा कमा लेते थे। उन्हीं दिनों पांचो से शादी कर उसे अपने साथ पंजाब भी लेकर गए थे। शहर में रहने का अनुभव अलग और अनोखा था पांचो के लिए तब। बड़े बेटे के जन्म के बाद पांचो के पति ने पैसे जोड़कर एक आटोरिक्शा लिया और अपने ही गांव से बस स्टेंड तक चलाने लगे। पांचो के जेठ जी ने भी एक पेट्रोल पम्प पर साझेदारी में काम शुरु कर दिया। घर में किसी बात की कमी नहीं थी। जेठानी को भी एक लड़का और एक लड़की थी। थोड़ी सी जमीन भी थी जिसका काम जेठानी देखती थी और पांचो उनके बच्चों का भी ख्याल रखती थी। गांव में ही पांचो ने अपने दूसरे बेटे को जन्म दिया।


   धीरे - धीरे पांचो के पति को पान और गुटखे की लत ने जकड़ लिया। पांचो और बच्चे कितना भी समझाने की कोशिश करते वह आदत छोड़ने की जगह, उसका नुकसान समझने की जगह कहते कि, अपने मन से दो चार रूपए का पान, गुटखा या तंबाकू भी नहीं खा सकते हैं क्या। दिन-रात इतना मेहनत करने वाले इस शरीर को इतना आसानी से बिमारी पकड़ कर‌ जमीन पर पटक कर माटी में मिला देगा क्या। घर में तो कुछ कम भी खाते थे पान मसाला। लेकिन, बाहर निकलते ही घर‌ लौटने तक मुहं में जर्दा पान ,गुटखा और तंबाकू भरा रहता था।


आखिर वही हुआ जिसका डर था मुहं के कैंसर ने पहले कमाई का जरिया फिर जमीन, स्त्रीधन अंत में पांचो के पति को भी निगल लिया। सबकुछ धाराशाई होकर‌ बिखर गया। जिस घर में रानी की तरह रहती थी, जेठ जेठानी के लिए जो बहन से बढ़कर थी उसका वह सम्मान और स्थान भी छीन लिया गया। नौकरों सा व्यवहार और बच्चों को खाने पीने के लिए भी तरसता हुआ देखकर आखिर वह ससुराल से निकल आई थी।‌


गांव के पास का कुआं अब दिखाई देने लगा था और शाम भी अपने कदम बढ़ा रही थी।‌ धूप तिरछी हुई और लू लहर भी थमने लगे थे। कुएं के पास पहुंचकर देखा तो पानी निकालने वाली बाल्टी नज़र नहीं आई। 

थोड़ी दूरी पर कुछ गांव की औरतें पानी लेने के लिए आती हुई दिखाई दी। 


गांव की महिलाओं ने पांचो को पहचान लिया और हाल चाल पूछने लगीं। बच्चों को प्यास लगी थी इसलिए पांचो ने एक पहचान की काकी से बाल्टी लेकर रस्सी से बांधकर कुएं में डालकर पानी भरकर बच्चों को पिलाया और उनके हाथ पैर‌ धुलाए फिर खुद भी पानी पिया पांचो ने। 


गांवों में सबको एक दूसरे की खबर होती है। पांचो के पति के देहांत की खबर भी सबको‌ थी और‌ वजह भी सभी जानते थे। एक बूढ़ी काकी ने बोला " माटी के शरीर पर कभी घमंड नहीं करना चाहिए " ये बस एक चोला है जिसे पहनने वाले को सम्भाल कर रखना चाहिए। जैसी देखभाल वैसी दशा सुनिश्चित है इस शरीर की। जवान हैं तो कुछ नहीं होगा या बूढ़ा हो गए तो शरीर निर्थक हो गया ऐसा विचार नहीं रखना चाहिए। जीते जी शरीर को सोने चांदी से सजाओ या कीमती गहनों से।‌ आखिर में मिलना मिट्टी में ही है सबको। सभी पांचो को ढांढ़स बंधाया और आशिर्वाद देकर चली जाती हैं। 


पांचो अब भी कुएं के पास खड़ी थी और निहार रही थी कुएं को। उसे वो दिन याद आ गया जब वह बारह या तेरह साल की थी और इस कुएं के चारों तरफ यह चबूतरा नहीं था तब वह कुएं में फिसलकर गिर गई थी रस्सी लगी बाल्टी के साथ। उस दिन एक चरवाहे ने उसे बचाया था। सालों तक वह कुएं से पानी भरने से डरती थी। एक वो दिन था जब कुएं के पास जाना उसे मुश्किल लगता था और‌ एक आज का दिन है हर‌ डर‌ और भय से मुक्त होकर वो खड़ी थी।‌ एक सोच है इस समय पांचो के मन" अगर कुएं से बाहर उसे कोई नहीं निकालता और वो मर गई होती तो बेहतर होता आज जो हालत है वो नहीं रहती या शायद जिन्दगी मर कर आसान नहीं होती बल्कि हालातों से लड़कर, उनसे जीत कर ही हम इस जीवन को सार्थक बना सकते हैं। 


तभी बच्चों ने पांचो को कहा" मां वो देखो नानी और मामी जी आ रही हैं। पांचो ने आगे बढ़कर मां और भाभी के पैर छूकर आशीष लिया और गले लग गई दोनों के। 


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