किस्सा इमरती का
किस्सा इमरती का
हमारे जीवन में प्रतिदिन न जाने कितनी घटनाएँ घटित होती हैं किन्तु कुछ ऐसी होती हैं जो स्मृति के रूप में सदैव जीवित रहती हैं | हम तीनों बहन भाई में एक खास बात यह थी कि जहाँ एक जैसे कपड़े पहनते थे वहीं एक जैसे बर्तन में खाना खाते थे | मजाल है कि कोई चीज किसी के पास ज्यादा या कम चली जाए |
मैं अपने घर में सबसे लाडली थी... दो भाईयों की इकलौती बहन जो ठहरी | मेरे पापा जिनके मैं बेहद करीब थी मेरे खाने-पीने की मनपसन्द चीजों का विशेष ख्याल रखते थे | फलों में मुझे जामुन्, लीची और खरबूजा पसन्द थे | पापा पहले से ही मेरे लिये उन्हें अलग से निकाल देते थे और सबको खास तौर पर हिदायत दी जाती कि ये मेरी बिटिया के लिये है |
बता नहीं सकती कि कितना गर्वित महसूस करती थी स्वयं को ...सबसे खास... मुझे कभी भी कहने की जरूरत नहीं पड़ती थी कि मुझे क्या चाहिए ?
एक बार जब हम दशहरे का मेला देखने गए तो वहाँ पापा ने हमें इमरती खरीद कर खाने को दी | मैंने उसे तब पहली बार खाया था , उसके बाद तो वह मेरी पसंदीदा मिठाईयों में शामिल हो गई | हमारे घर में बाजार से मिठाईयाँ कम ही आतीं थी , उन्हें अक्सर घर पर ही बनाया जाता था | मेरी मम्मी सभी तरह की मिठाईयाँ बनाने में पारंगत थीं | यह कला उन्हें विरासत में मिली थी|
अब बात इमरती की चली है तो एक किस्सा याद आ रहा है... जब मैं होस्टल में रहती थी तो मेरे पापा मेरे जन्म दिन पर मेरे सभी कक्षा के बच्चों के लिए इमरती, कचौड़ी और टॉफियों के पैकेट लाए थे | उस दिन के बाद से सभी मुझे इमरती वाली लड़की कहकर बुलाने लगे |
आज इस घटना को अट्ठाईस वर्ष हो चुके हैं , अब पापा तो रहे नहीं, न ही इतना ख्याल रखने वाला कोई.... जो पापा की तरह मेरी छोटी -छोटी पसंद का ध्यान रख सके... मैं अभी भी वैसी ही हूँ , कभी भी किसी से कुछ नहीं कहती कि मुझे क्या चाहिए? शायद अभी भी मुझे लगता है कि पापा की तरह कोई मेरे मन की बात समझ ले और बिना कहे ही मेरी पसंद की चीज मुझे मिल जाए|
