बेटी तू ठीक तो है ना?
बेटी तू ठीक तो है ना?
"माँ आप दुखी न हो मैं बहुत खुश हूँ।"
काव्या ने माँ को फ़ोन पर कहा पर रोकते रोकते भी हलक से रुलाई बाहर आ गई जिसे उसने बड़ी मुश्किल से जोर से हँसते हुए आवाज़ की लड़खड़ाहट को सँभालने की कोशिश की और जल्दी से फ़ोन रख दिया।
उसके फ़ोन रखने के बाद ललिताजी का मन विचलित हो गया। होता भी क्यों नहीं, आखिर माँ का मन था जो अपनी औलाद की आवाज़ के उतार चढ़ाव से ही उसकी मनोदशा भाँपने की क्षमता रखता है।
ललिताजी सोचने लगी ऐसी क्या वजह थी जो काव्या इतनी उदास लग रही थी आज फ़ोन पर।
अभी उसकी शादी को सात महीने ही तो हुए थे। एक तो नई गृहस्थी और ऊपर से कड़क सास,
कैसे संभालती होगी मेरी नाजुक बेटी। लेकिन साथ ही ललिताजी यह भी जानती थी कि उनकी लाडली काव्या घर गृहस्थी के कामों में थोड़ी कच्ची है और अनुभवहीन भी।
ऐसे में उससे गलतियाँ तो होती होंगी बस कोई उसे प्यार से समझाए तो वह गलती दुहराती नहीं, इतना वह अपनी बेटी के लिए गारंटी के साथ कह सकती थी।
फिर भी आज किस बात पर काव्या का दिल दुखा होगा यह जानने की उत्सुकता को वह किसी तरह दबाकर खुद को किसी तरह घर के कामों में और टी. वी. देखने में लगाए रहीं कि शाम को काव्या के पापा सुधीरजी आ जाए तो वो बेटी की रूँधी आवाज़ का दर्द उनसे बाँटकर कुछ अपने दिल का बोझ हल्का कर सकें।
घर के छोटे मोटे काम निपटाकर टी. वी. खोलकर बैठी ही थी कि मन फिर बच्चों के इर्द गिर्द घूमने लगा। कुणाल और काव्या इन दो बच्चों के बचपन से सजा उनका घर अब सूना सूना हो गया था। दोनों बच्चों को उन्होंने बड़े लाड़ प्यार से पाला था, साथ ही उन्हें अपनी मर्ज़ी का कैरियर चुनने की भी पूरी स्वतंत्रता दी थी। काव्या उनकी पहली संतान थी और उन्होंने उसे कुछ ज़्यादा ही लाड़ से पाला था। उसने एम. बी. ए. करने के बाद जब एक प्रसिद्ध कंपनी में जॉब ज्वाइन कर लिया और बेटे कुणाल ने अपना ड्रीम जॉब एयरफ़ोर्स ज्वाइन करके ट्रेनिंग पर चला गया था।
कुणाल के जाने पर उनका पूरा ध्यान काव्या पर चला गया था। ललिताजी अपनी बेटी से खूब लाड़ लगाती और उसे रसोई वगैरह के काम से थोड़ा दूर ही रखती। सोचती, इसे ससुराल जाकर तो यह सब करना ही है बस जब तक मेरे पास है इसे फूलों की तरह रखूँ। और यही एक छोटी सी गलती हो गई उनसे कि काव्या को घर और रसोई का काम व्यवस्थित ढंग से करना नहीं आता था और आए दिन उसकी सास उसे रसोई के छोटे छोटे टिप्स बताते हुए काम सीखा रही थी। उसी दौरान कभी उनका लहज़ा सख्त हो जता तो काव्या अपनी माँ को फोन कर लेती थी।
वैसे एक बात अच्छी थी कि रामाकांतजी और अमन उसे कुछ नहीं कहते थे। एक पति के रूप में अमन बहुत सुलझा हुआ था और दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार भी करते थे।
ललिताजी को याद आया कि अभी काव्या ने अपना एम. बी. ए. समाप्त करके एक कंपनी में नौकरी की शुरुआत की ही थी कि उनके एक रिश्तेदार ने अमन का रिश्ता बताया था. दो बड़ी बहनों के बाद अमन कल्याणीजी और रमाकांतजी की तीसरी औलाद था और वह भी एक कंपनी में इंज़ीनियर था।
रमाकांतजी रिटायर्ड हो चुके थे और उनकी पत्नी कल्याणीजी एक एन. जी. ओ. में प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत थीं। दोनों बेटियों की शादी हो चुकी थी और अमन सबसे छोटा था। एक अच्छी कंपनी में इंजिनियर के पद पर कार्यरत सौम्य स्वाभाव वाला अमन काव्या को बहुत अच्छा लगा था। परिवार अच्छा और प्रतिष्ठित था, सिर्फ कल्याणीजी थोड़ी अनुशासनप्रिय लगीं। शादी के वक़्त यही बात ललिताजी को खटकी थी। और ललिताजी का यही डर तब और मुखर हो जाता जब कभी अपनी बेटी की आवाज़ में उदासी देखती।
इसके पहले भी काव्या अक्सर बताती रहती थी कि उसकी सास किस तरह उसे गृहस्थी के कार्य सिखाती है और इस क्रम में कभी कभी कुछ सख्त भी हो जाती थी। पर ललिताजी ज़्यादा कुछ नहीं बोलकर उसे समझाती कि वो ध्यान लगाकर काम किया करे।
आज भी फोन पर काव्या की आवाज़ से लगा कि वो आज रोई है तो माँ का हृदय द्रवित हो गया।
सच तो ये था कि ललिताजी का बहुत बार मन किया कि एक बार फिर से फ़ोन लगाकर बेटी के दिल का हाल पूछ लें, पर बहुत मुश्किल से खुद को रोका। उन्हें पता था आज जिस किसी वजह से भी काव्या दुखी होगी उनके दुबारा फ़ोन करने भरभराकर सब कह देगी और हो सकता है आवेश में उनके मुँह से भी काव्या की सास कल्याणीजी के लिए कुछ ऐसे नकारात्मक शब्द निकल जाए जिससे काव्या अपनी सास को और भी नापसंद करने लगे इससे आखिरकार सास बहू के बीच दूरियाँ ही तो बढ़ेंगी। इसलिए खुद को किसी तरह संयत रखा।
शाम को जब पति घर आए तो उन्होंने चाय नाश्ते के साथ अपनी चिंता भी परोस दी। सुनकर पहले तो सुधीरजी खामोश रहे फिर जैसे कुछ याद करते हुए बोले,
"मालकिन! आपको अपनी बेटी की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हमारी बेटी भोली है लेकिन बेवकूफ़ नहीं है। आखिर एक कंपनी की एरिया मैंनेज़र है।
हाँ! घर गृहस्थी में थोड़ी कच्ची ज़रूर है, पर मुझे यक़ीन है कि हमारी समधनजी उसे वह सब सीखा देंगी जो आपने माँ होने के लाड़ में नहीं सिखाया था।
आपको याद नहीं जब हमारी नई नई शादी हुई थी तब आप भी अपनी माँ से बात करते हुए ऐसे ही रो पड़ती थीं और मेरी और मेरी माँ की कितनी बुराई करती थीं। ज़रा सोचिये, अगर उस वक़्त आपकी माँ आपकी हाँ में हाँ मिलाते हुए आपको और भी शह देती तो आपका गुस्सा और बढ़ता और कदाचित हमारी गृहस्थी में इतनी खुशियाँ इतनी समझदारी नहीं होती जैसी आज है। तो समझ लीजिये अब आपको भी वही भूमिका निभानी है, बेटी जब सास और ससुराल की बुराई करे तभी शह नहीँ देकर चुपचाप सुन लेना है बस। बाद में जब उसका मन शांत हो जाए तो उसे प्यार से समझा देना है कि ऐसा हर घर में होता है और आपसी तालमेल से ही घर परिवार में खुशियाँ पनपती हैँ!"
ललिताजी आज मन्त्रमुग्ध होकर पति की बात सुन रहीं थीं जिसमें गृहस्थी की खुशहाली का मुलमंत्र छुपा हुआ था। सुधीरजी ने हमेशा अपनी माँ और पत्नी में सामंजस्य बैठाने की कोशिश की थी। वह प्यार से अपनी पत्नी को मालकिन कहा करते थे। और उन्हें मालकिन की तरह ही रखते भी थे और उनकी गृहस्थी में ज़्यादा हस्तक्षेप नहीं करते थे, पर चुँकि आज बात अपनी बेटी की थी तो निष्पक्ष बात तो कहनी ही थी।
शाम की चाय से दोनों निपटे ही थे कि काव्या का फ़ोन आया। अभी उसकी आवाज़ में ख़ुशी साफ झलक रही थी।
थोड़ी इधर उधर की बातें करने के बाद ललिताजी ने पूछ लिया कि सुबह क्या हुआ था तो काव्या हँसते हुए बोली कि,
"वो आज सुबह दूध उबलकर गिर गया था तो सासु मां ने झाड़ पिलाई थी अभी हम सब आइसक्रीम खाने बाहर आए हैं, साथ में मम्मीजी और छोटी ननदजी भी आईं हैं!"
सबके साथ काव्या के चहकने की आवाज़ से उसकी ख़ुशी का अंदाजा लगाया जा सकता था, ललिताजी का उद्गिन मन बेटी की हँसी सुनकर शांत हो चुका था।
यह बात सही है कि अक्सर माँएं अपनी ससुराल में रहनेवाली बेटी की चिंता की वजह से उनकी गृहस्थी में कुछ ज़्यादा हस्तक्षेप करने लगती हैं जो उचित नहीं है। हर रिश्ते को पुख्ता होने में थोड़ा वक़्त तो देना ही पड़ता है। और नए रिश्ते में प्रेम के साथ एक दूसरे को अपनाना और नए घर की रीति रिवाज को समझना भी ज़रूरी होता है। तभी एक खुशहाल गृहस्थी की मजबूत नींव पड़ती है।
(समाप्त )
