Pooja Mani

Others


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बड़े घर की बहुरिया होने की क़ीमत

बड़े घर की बहुरिया होने की क़ीमत

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रुपा की माई किधर हो ??? हम तुहरा के खेत से लेकर खलिहान तक कहाँ कहाँ ना ढूंढी?? तुम यहाँ बड़की के घर बैठ कर बतियात हो ?? कमली खुशी से बौराते हुए रूपा की माई से कहा। क्या हुआ इतने उतावले क्यों हुए जा रहे हो ?? पगला गए हो का रुपा के बापू ??इतना क्यों शोर मचाते हो ?? रूपा की माँ ने शांत कराते हुए कहा। अपनी रुपा के लिए जमींदार के घर से रिश्ता आया है । कमली ने एक सांस में कह दी । क्या सच कहत हो रूपा के बापू ,,हमरी रुपिया के लिए जमींदार के घर से रिश्ता आया है,, हमरी राजकुमारी के भाग्य ही खुल गए आंसुओं की झड़ी बरस पड़ी रूपा की माई के आंखों से । मजदूरी की बेटी को जमींदार अपने घर की बहू क्यों बना रहे हैं ??तनिक सोचो तो बड़की ने कमली से सवालिया लहजे में कहा। तुम्हे इससे क्या बड़की ,,हमरी बिटिया स्कूल जात है साथ ही साथ दसवीं पास है ,,इस पूरे गांव में हमरी रुपिया ही पढ़ी-लिखी लड़की है ,,रँग देखा है उसका सेठानी से कम ना लगत है हमारी रुपिया ,,,,,,कमली ने बड़की के सवालों पर विराम लगा दिया। रुपा के बापू ब्याह कब होई ?? इतने बड़े घर की बारात स्वागत की तैयारी हम सब से कैसे होई,?? घबरा कर रुपा की माई रुनकी ने कहा। तू चिन्ता मत इही चैत मैं हमरी रुपिया के ब्याह हो जाई। सारा व्यवस्था मालिक खुद ही करी । कमली ने हंसते हुए कहा। अच्छा चलो हम ई खुशखबरी रुपिया के देत हैं ?? कालिज से आवत होगी ?? चक्का डूबने(शाम) तक तो आ जावत है । रुनकी के आंखों से खुशी से चमक उठी। माई जल्दी से खाना लगा दो ,,हमरा खूब जोरो से भूख लागल है ।

भूख से व्याकुल रूपा ने कहा। हाँ खा ले माई के हाथों का खाना राजकुमारी का पता अब तुहरा अब माई के हाथो से खाना पंसद आबे भी की ना ?? रुनकी ने अपनी पल्लू आँखों की गीली होती कोरो को पोंछते हुए कहा। का बात करत हो माई हमका तुहरे हाथ का रूखा -सूखा खाना छप्पनभोग से कम नही लागत है। रूपा बच्चे की तरह अपनी माई के गले मे झूल गई। चल छोड़ ई बचकानी चाल अपन ,,अब तो तुम बड़का घर के बहुरिया बनन वाली है,,,रुनकी ने हंसते हुए कहा। का बात करत हो माई हम अभी ब्याह ना करी ,,हमरा पढ़ लिख के गांव के मास्टरनी बने के है,, रूपा ने रोते हुए कहा। तुहरा बापू सब तय कर के आ गया है ,,तू का हमरी नाक कटाई पूरे बिरादरी के सामने ,,जितना पढे के है तू बहुत पढ़ ली रुपिया।रुनकी ने डांट कर रुपा को चुप करवा दिया। तय समय पर हवेली में जाकर रुपा का विवाह कार्यक्रम शुरू हो गया। जब अठारह वर्ष की रुपा ने तिरपन वर्षिय जमींदार रघुनाथ जी को अपने जीवनसाथी के रूप में देखा तो उसे बड़े घर की बहुरिया बनने की असली वजह मालूम चल गया था। माई मैं तुम लोग पर बोझ बन गई थी तो मुझे जन्म ही क्यों दिया?? रूपा ने रोते हुए कहा। रुनकी के पास रुपा के सवालों का कोई जवाब नही थी,,वह शून्य में ताकती अपनी फूल सी बच्ची का जीवन कांटों से भर जाने का दोषी कमली को ठहरा रही थी।पर रुनकी भी नही जानती थी कि दोनों पति पत्नी जमीदार के धूर्तता का शिकार हो गए थे। जमींदार की पत्नी को गठिया की बीमारी हो गई थी साथ ही साथ शरीर से भी लाचार हो गई थी ,,इसलिए जमींदार को अपने बच्चे के देखभाल के लिए एक माँ औऱ खुद जमींदार के मन बहलाने के लिए एक औरत की जरुरत थी। कमली औऱ रुनकी कुछ कर भी नही सकते थे ,,,अब दोनों अपनी फूल सी बच्ची रूपा को रघुनाथ जैसे हैवान के हाथों सौपने को विवश थे। सुहाग के सेज पर बैठी रुपा अपने अंधकार मय जीवन के डर से सिसकी ले रही थी । तभी नई मम्मी तो बहुत सुंदर है कह कर बारह वर्षीय भूमि रुपा से लिपट गई। रुपा को लगा जैसे भूमि ही उसके अमावस्या वाली रातो के बाद आने वाली पुरमासी की चाँद है। भूमि बेटा आप यहाँ क्या कर रहे हो?? एक कड़कती आवाज सुनकर भूमि झट से भाग खड़ी हुई। किवाड़ बन्द कर ,,रघुनाथ जी पास आकर खड़े हो गए। आपको शर्म नही आती अपनी बेटी की उम्र की लड़की से ब्याह रचाते हुए ।

रुपा ने चीखते हुए कहा। दो चार तमाचे जड़ते हुए रघुनाथ जी ने कहा मुझसे इतनी ऊंची आवाज में बात करने की तुहरी हिम्मत कैसे हुई?? तुहरे बापू के हमने पांच बीघा खेत दिए हैं खेती के लिए औऱ साथ ही साथ तुझे रानी बनाकर रखेंगे इस हवेली में,,इतना कहकर रघुनाथ जी भूखे भेड़िया की तरह टूट पड़ा रूपा पर। रूपा दर्द और अपमान से तिलमिला उठी । रघुनाथ अपने पुरुषत्व के घमंड में रुपा को कुचलता गया। सुबह जब रूपा उठी ,,उसकी नजर आईने पर पड़ी । औऱ खुद पर मुस्कुरा उठी । बड़े घर की बहुरिया होने की कीमत अब उसे हर रात अदा जो करनी थी। सुबह तैयार होकर जब कमरे से बाहर निकली तो उसकी नजर व्हीलचेयर पर बैठी भावना दीदी पर पड़ी ,,रघुनाथ जी की पहली पत्नी और इस हवेली की मालकिन ।। आओ रूपा तुझे एक बात बता देती हूँ ,,रघुनाथ जी सारी जिम्मेदारी सिर्फ मेरी है। तुम्हें यहाँ सिर्फ मेरे बच्चे की देखभाल के लिए लाया गया ,,भूल से कभी खुद को इस हवेली की मालिकन मत समझ बैठना । भावना अंहकार में रूपा को नीचे दिखाए जा रही थी। ये तो वक्त के हाथों में है दीदी कहकर भावना के पांव छू कर आशीर्वाद लेने को आगे बढ़ी। अपनी छोटी बहन समझ कर मुझे आर्शीवाद दो दीदी। भावना ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेर दिया। तभी रूपा के चोटिल चेहरे पर भावना की नजर गई । मैं रघुनाथ जी से इस बारे मे बात करूंगी । लंबी सांस लेते हुए भावना ने कहा। दीदी इसकी कोई जरूरत नही है जो मेरे साथ हुआ है वो तो आप बरसों से झेलते हुए आ रही थी । जब इतने सालों से आप कुछ ना बोल पाई तो अब आप क्या कमाल कर देगी ?? रूपा ताना देकर वहाँ से निकल गई। भूमि को स्कूल के लिए तैयार कर रुपा अपने कॉलेज जाने के लिए निकलने लगी । दीदी आप मेरी मदद करोगी ना आगे पढने जारी रखने में ,,रूपा ने आस लगाकर कहा। तुम बेझिझक होकर अपनी उड़ान जारी रखो ,,मैं तुम्हारे पँखो को आसमान में पसारने से जरूर मदद करूंगी । भावना ने प्यार से रूपा के सर पर हाथ रख कर अशश्वसन दिया। धीरे धीरे रघुनाथ जी का अत्याचार और बढ़ता गया।। भावना दीदी और भूमि के सहारे रूपा हवेली में जीवन गुजारने लगी। भूमि के मदद से इंटरनेट चलाना सीख ली थी ,,,उसमे नई नई कसरत देख कर भावना का इलाज करने लगी । भावना की स्थिति में पहले से काफी सुधार होने लगी । यह देखकर भूमि भी रूपा के औऱ करीब आ गई । रूपा बखूबी अपनी पढ़ाई और अपने हवेली के प्रति जिम्मेदारी निभाए जा रही थी। रुपा अपने जीवन से संतुष्ट होते जा रही थी कि उसपर वज्रपात हो गया। रूपा गभर्वती हो गई । रूपा अपने जीवन मे अचानक आये इस बदलाव से घबरा गई। रघुनाथ जी खुशी से नाच उठे ,,उन्हें इस हवेली का वारिश जो मिलने वाला था। भावना से उन्हें केवल एक पुत्री ही तो थी ,,रुपा से उन्हें पुत्र की लालसा थी । रूपा से विवाह का असली मकसद ही पुत्र प्राप्ति था। रूपा इन सब से अनभिज्ञ सोच रही थी ,,कि रघुनाथ जी ने उसके देह का सुख भोगने के लिए विवाह वेदी की भेंट चढ़ाया है। रुनकी औऱ कमली भी खबर सुनकर भाग कर रुपा से मिलने आये। रुपा ने बेरुखी से अपने माता-पिता का स्वागत किया औऱ कहा आप अपने सेठानी से मिलने आये हैं । माई -बापू तुम्हरी बेटी इस हवेली के चकाचौंध में कहीं खो गई है यहाँ तोहे सिर्फ हवेली की सेठानी मिलेगी । रूपा ने रुपये की एक गड़ी बढाते हुए कहा। रुनकी औऱ कमली अपना मुंह लटका कर वहां से वापस चले आये। भावना भी पहले से बेहतर हो गई थी ,,रूपा का पूरा ख्याल रखती ।

भूमि भी दिन भर आगे पीछे डोलते रहती थी। रुपा भी आने वाले सुखमय जीवन के सपने संजोने लगी थी। रघुनाथ जी रूपा का ख्याल तो रखना चाहते थे पर रुपा उन्हें अपने पास भी फटकने नही देती थी। रूपा रघुनाथ जी मे आया बदलाव तो महसूस कर रही थी पर उन काली रातो को भुला देना उसके लिए इतना आसान ना था। रूपा हमे माफ कर दो ,,हमने तुम्हारे साथ जानवरों सा बर्ताव किया ,,,रघुनाथ जी शर्मिंदगी के साथ नजर झुकाये रूपा के सामने खड़े थे। आपने तो हमसे बडे घर बहुरूरिया होने की कीमत वसूला है इसमें आपकी क्या गलती है?? मजदूर की बेटी रुपिया को अपने हवेली की रूपा देवी का दर्जा दिया ,,रुपये पैसे गहने ,,जेवर सबकुछ दिया औऱ मुझे क्या चाहिए मालिक !!! रूपा सिसकते हुए बोली। हम जानते हैं हमसे बहुत बडी गलती हुई है ,,अपने पुरुषत्व के घमंड में तुम्हारे अरमानो को कुचलता गया। मैं भावना से बहुत प्यार करता था इसलिए तुम्हे अपनी पत्नी की तरह कभी अपना नही पाया ।तुम्हे बस भोग करने की वस्तु समझा ।फिर हमारे उम्र में भी बहुत फासला था ।तुम्हारी यातनाएं देकर तुम्हारी चीखों से मन ही मन मैं आनन्दित होता था। रघुनाथ जी रौंधे गले से रूपा से सारी बाते कह गया। उम्र से प्यार का तो कोई लेना देना नही होता मालिक !! मैं अब आपसे कुछ मांगना चाहती हूँ ,,अगर मैं लड़के को जन्म नही दे पाई तो मेरी बेटी को भी आप खुले दिल से अपनाओगे मालिक !! आंखों में एक उम्मीद लिए रूपा ने रघुनाथ जी तरफ अपना हाथ बढ़ाया। रूपा मैं वचन देता हूँ ,,इस अँगने में जो भी फूल खिलेगा उसका पूरा प्यार और सम्मान मिलेगा औऱ एक बात रूपा तुम्हे इस हवेली में भावना के जैसा ही दर्जा मिलेगा । रूपा को अपने बाहों में भरकर रघुनाथ जी ने कहा। रूपा अपने पति का इतना अपनापन पाकर रो पड़ी । रघुनाथ जी ने उसके आंसू को पोंछते हुए कहा रूपा तुमने जो समपर्ण मेरे परिवार के तरफ दिखाया है ,,उससे तुमने मुझे भी जीत लिया। रूपा के जीवन मे सब ठीक हो गया था,,इतना प्यार करने वाला पति नई माँ कहकर उसके आगे पीछे हमेशा रहने वाली भूमि और उस पर हमेशा प्यार लुटाने वाली भावना दीदी ,,बड़े घर की बहुरिया होने अब उसे सही महत्व पता चला था।रूपा का डिलवरी का समय नजदीक आ गया था। रूपा को शहर ले जाएगा ,,उसके डिलवरी में कुछ समस्या आ गई ,,अत्यधिक रक्त स्राव हो जाने के कारण रूपा दुनिया को अलविदा कह गई ,,लेकिन जाते जाते बड़े घर की बहुरिया होने की कीमत अदा कर गई ,,रघुनाथ जी के हवेली को वारिश की रौशनी से रोशन कर गई।


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