वो सतरंगी पल
वो सतरंगी पल
माँ के आँचल की छांव तले,
बीते थे, जो अदभुद् से पल,
जो प्यार मिला उनसे,
अब नही मिलेगा कल।
वो सतरंगी पल......
पिता का हाथ सर पर,
एक ढांढस देता, था भर,
न चिंता कोई फिकर,
किसी बात का नहीं था डर।
वो सतरंगी पल......
बचपन के मित्र सभी,
मिलते थे कभी कभी,
भूले से, ना भूलेंगे,
बीते थे जो पल वो सभी।
वो सतरंगी पल...........
वो भाई बहन का प्यार,
जैसे सावन कि हो फुहार,
खट्टी, मीठी टकरार,
मन में भर देती प्यार।
वो सतरंगी पल........
जब विवाह का आया पल,
तब मन में थी हलचल,
मुझसे ज्यादा तो माँ,
करती चिंता हरपल।
वो सतरंगी पल......
साजन के आँगन की,
वो सतरंगी बगिया,
जहां प्यार का था आँचल,
जिसे ओढ़ हुई पागल।
वो सतरंगी पल....
पायल की छ्न छ्न सुन,
आ गई हो क्या अब तुम?
सुनकर इस पंक्ति को,
मन हो जाता चंचल।
वो सतरंगी पल.....
उसकी भीगी बातें,
तरुवर या नदी कोई,
आवाज वो मीठी सी,
हो ध्वनि कोई कल-कल।
वो सतरंगी पल.....
