STORYMIRROR

Sandhya Sharma

Others

4  

Sandhya Sharma

Others

मेरी रसोई का "वो कोना"

मेरी रसोई का "वो कोना"

1 min
226


मेरी रसोई का वो कोना

जहां.... मेरी लेखनी से उपजा

हर एक शब्द बना सोना।


वर्षों बिताये ढेरों व्यंजन बनाने में,

लेख कई लिख गये कलछी चलाने में

गढ़ी हैं पंक्तियां कई चाय के प्यालों में,

स्वाद बढ़ाया मैंने घर के मसालों में,


बहुत करीब हूं मैं इसके और यह मेरा अजीज है,

तभी तो मेरा हर सुख दुख, इसमें आज भी सजीव है।


बहे हैं आंसू अविरल, मेरे नेत्रों से अक्सर

जब भी गई मैं इसमें, अपना जी भर कर

किया है कई बार मैंने हल्का खुद को

और अपने, बोझिल दिल को,


एक यही तो है, जिससे 

नाता मेरा टूटता ही नहीं

और एक मैं हूं कि साथ इसका छूटता भी नहीं.....


ना चाह कर भी, मेरी चाहत मुझे,

खींच लाती है यहां,

आंसू बहाने हो... तो और 

जाऊं भी कहा ?


यह मेरे दिलो दिमाग में 

बस गया है कहीं,

आंख खुलते ही अपने आप को 

पाती हूं यहीं,


जैसे एक बच्चा उठता है,

आंख मलता है और बंद आंखों में ही बढ़ता.... चलता है,

जब तक टकरा ना जाए उस मैया से

जो मिलती है अक्सर उसे रसोइया में


हाल मेरा भी कुछ उसके जैसा है,

चाहे मुंह दबाकर हंसना हो 

यह फफक फफक कर रोना हो

कुछ मिले ना मिले.... 

बस मेरी रसोई का वो कोना हो।

बस मेरी रसोई का वो कोना हो।



Rate this content
Log in