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प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

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प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

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ताँका : वसंत

ताँका : वसंत

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आया बसंत 

खिल उठी सरसों 

शोभा अनंत 

सुरभित पवन

मधु दिग-दिगंत।


आई बासंती 

कोयल के कण्ठ से 

फूटते गीत 

गुनगुनी सी धूप 

जगाती मन-प्रीत ।


टेसू दहका 

उठी अमुवा गंध 

टप.. महुआ 

घोलने सबरंग 

आया जग बसंत।


प्रेम का दूत 

जगाने को आया है

मन की हूक

ये बसंत रंगीला 

हठीला महबूब।



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