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Nirmal Jain

Others


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Nirmal Jain

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सूखता नीर

सूखता नीर

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कौन समझता है

धरा की पीर


कटते वन

धरती में दरारें

झुलसे तन


बने झंझाल

चारों तरफ उगे

कंक्रीट झाल


व्यर्थ न बहे

जल ही जीवन है

दुनिया कहे


सुन ले भाई

बढ़ता रेगिस्तान

प्यासा राही



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