सुहानी शाम
सुहानी शाम
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ये खामोश सी प्रकृति,,,
ये मध्यम पवन ॥
ये बारिश की हल्की फूहार ,,
और ये विचलीत मन ॥
ये पक्षियों की चहचहाहट,,
ये भौरों के आने की आहट ॥
सुहाना सा ये मौसम,,,
और ये बादलों की मुस्कुराहट ॥
सब याद दिलाते हैं,,
गुजरे हुए उन पलों का ॥
गाँव में जो बिताए थे हमने,,,
उन हसीन बचपन के लम्हों का ॥
सब कितना बदल गया,,
वो सुकून कहीं खो गया॥
अब शहर में शाम सुहानी नहीं होती,,
अब प्रकृति का सुहानापन कहूं खो गया ॥
