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Hardik Mahajan Hardik

Others

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Hardik Mahajan Hardik

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सिखलायेगा

सिखलायेगा

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सिखलायेगा वह ऋतु,एक ही अनल है,

ज़िन्दगी नहीं वह जहाँ नई हलचल है,

जिसमें दाहकता नहीं,न तो गर्जन है,

सुख की तरंग का जहाँ अंध वर्जन है,

जो सत्य राख में सने,रुक्ष रूठे हैं,

हर नए रंग तरंग जहाँ खिलखिला सा है,

एक नहीं अनेक में मन लुभा जाएँ,

जहाँ ख़ूब पन्नों में लिखा यही तो संसार है!



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