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Vijayanand Singh

Others

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Vijayanand Singh

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रंग उभरते ही नहीं

रंग उभरते ही नहीं

1 min
200


कल्पना की कूची से

धरती के कागज पर

उकेरना चाहता हूँ एक चित्र।

मगर, रंग उभरते ही नहीं।

सूख गया है आँखों का पानी

भावनाओं से दिल पसीजते ही नहीं।

और संवेदनाओं की मिट्टी

गीली ही नहीं होती!


रचना चाहता हूँ

भाव भरे प्रणय-गीत।

मन की कोमलता से

शब्द ले-लेकर।

मगर, अक्षर उतरते ही नहीं।


अनुभूतियों की स्याही 

सूख गयी हो जैसे

इस संवेदना शून्य समय में।

रूक गया हो जैसे

प्रेम का झरना

आस-विश्वास के इस मरूस्थल में !


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