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Vijayanand Singh

Others

3.8  

Vijayanand Singh

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पोथी पढ़ि पढ़ि

पोथी पढ़ि पढ़ि

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राम नाम की माला जप ली 

डाल गले में कण्ठी हार।

मंदिर - मंदिर द्वारे - द्वारे

ढूँढ़ रहे हैं तारणहार।


बेल, पुष्प और दूब चढ़ाते

हो जाएगा बेड़ा पार।

घर - घर में मंदिर बनवावें

मातु-पिता तरसें बिनु प्यार।


निशि दिन छप्पन भोग चढ़ावें

चाहे भूखा सोवै संसार।

पोथी पढ़ि पढ़ि पूजा बाँचें

प्रेम बिना जीवन बेकार।


क्या पूजा, साष्टांग दंडवत ?

अंधभक्ति का कारोबार।

धर्म जुड़ा जब राजनीति से

हो गया जग का बंटाधार।


ज्ञान - विज्ञान - प्रमाण सब भूले

भूले वैज्ञानिक व्यवहार।

कविता रचि-रचि राम भजें हम

राम बसाओ हिय में ध्याव।


मिटे अनीति-व्यभिचार जगत से

हो सत्कर्मों से जग उजियार।

राम राज्य आएगा तब ही

हो आदर्श जगत - व्यवहार।

- विजयानंद विजय


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