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Gaurav Shukla

Others

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Gaurav Shukla

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रे सखी

रे सखी

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रे सखी,

मैं बसंत बन जाऊँ,

किसानों के खेतों सा

मैं लहलहाऊँ,

झूम उठे मन बावरा,

गीत मीत का गाऊँ..


चलो पगडंडियों से,

पद चिन्ह देख कर आऊँ,

ऋतुराज,

हे बसन्त बहार...

सावन से इठलाऊँ...

धरा धरा रह जाए आज,

बस पंछी सी मैं उड़ जाऊँ।



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