पंक्षी उड़ चला
पंक्षी उड़ चला
1 min
106
है अभी उजाला
जहाँ चाहा उस डाल पे ठहरा
फैलाए पंख आनंद के
विचारा अनंत नील गगन में
हरितम प्रकृति के झूलो में झूला
पर सताती तो होगी
उसी घरौंदे की याद
जहाँ बंधी उसके हृदय की डोर
वियोग करता तो होगा विचलित
जहाँ छूटा उसका सबकुछ
जहाँ उसका बसेरा
तन स्वाधीन, मन बंधनतम
साध अपना गन्तव्य
वो फिर से आगे बढ़ा
पंक्षी उड़ चला
कि कहीं साँझ ढल ना जाए...
