नकाब
नकाब
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मुलाकातें तो आजकल हजारों से होती हैं ,
लिहाज और लहजा भी सबका नजाकत से भरपूर होता है,
इमरोज तबस्सुम से तकल्लुफ करते हैं कई,
पर कुछ आफरीन से चेहरों के पीछे ज़हरीला नकाब होता है,
पर फिर कुछ पल की मायूसी के बाद यह एहसास होता है,
कि क्या करना दूसरों से गम और शिकवा,
कुछ अपनो के चेहरे पर भी तो नकाब होता है,
जब अपने ही नकाबपोश हैं,
तो क्या रखना पराए लोगों से अपनेपन का ख्वाब,
जब हमारी खुशामदीद करने वालों के पास ही है नकाब !!
