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Poonam Bagadia

Others

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Poonam Bagadia

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नदी की आत्मकथा

नदी की आत्मकथा

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जब भी होती व्यथित मैं

चुपके से मुस्काती हूँ


चंचल हूँ नदी मैं,

सबको ही खूब भाती हूँ


गिरती, उठती, हर संघर्ष से

टकराकर आ जाती हूँ


कहीं रूप शांत सरोवर, 

कहीं अल्हड़ अठखेलियाँ खाती हूँ


चंचल लहरों संग चलकर, 

बस अपने दुःख छिपाती हूँ


खो कर पहचान अपनी

बस अपनों में मिल जाती हूँ


एक छोटी सी नदिया मैं, जाकर

सागर को अथाह बनाती हूँ...




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