नदी की आत्मकथा
नदी की आत्मकथा
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हिमालय से निकली एक
बहती पानी की धारा
बहते पानी की कलम से धरा पर
अपनी आत्मकथा सुनाने लगी।
हूं मैं एक ही तरह की धारा
बस भिन्न भिन्न मेरे नाम है
नदी नहर सरिता कभी
कभी मैं तटिनी कहलाने लगी।
सर - सर चली मैं सरिता बनी
सतत समग्र चलने लगी प्रवाहिनी।
दो तटों के बीच में तटिनी तो
मैं तेज चलकर क्षिप्रा बनी।
नित्यप्रति मेरा काम यही है खास
खेत खलिहानों की प्यार की प्यास
मिट जाती हैं और हरा भरा हो जाता
थार जब मेरे आने की होती है आस
यही मेरे जीवन की सार्थक सफलता है ।
मेरे बहने से ही मेरा यौवन झलकता है।
कैसे रुक जाऊँ किसी के कहने पर मैं।
आखिर सील से ही मेरा दिल मचलता है।
