STORYMIRROR

SANJAY SALVI

Others

3  

SANJAY SALVI

Others

“मयखाना”

“मयखाना”

1 min
339


शाम ढ़लते ही दिए जलते हैं,

आग लगती है सीने में,

कदम पड़ते हैं मयखाने में।

जाम तो हम यूं भी उठा लेते हैं ,

पर साकी के होठों से पीने का मजा कुछ और ही है।

शराब तो हम सभी पी जाते हैं,

पर उसकी आंखो ने जो पिला दी वो कुछ और ही है।

वैसे तो हम सीधे सीधे जाते हैं अपने ही घर,

पर लड़खड़ाते जाने का मजा कुछ और ही है उसके दर।

अब ना है हमें दुनिया से कोइ खौफ ना ही कोइ डर

सुबह के भूले हम शाम को जाते हैं मयखाने पर।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन