..मेरी कलम...
..मेरी कलम...
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मेरी कलम मेरा साथ बखूबी निभाती है
तन्हाई में भी आकर गले लगाती है
कड़कती धूप में
परछाई बन जाती है
ठंड मे
मखमल की चादर कहलाती है
मैं रूठ जाऊँ अगर
तो प्यार से मनाती है
सजदे करूं तो
दुआएं मेरी भी कहती है
गलती पर टोकती है
खुशियों पर गले लगाती है
हर कदम साथ रहती है मेरे
कविता ही मेरी मंजिल है अब
कलम साथ रहती है
फर्ज अपना निभाती है।
