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Anand Kumar

5.0  

Anand Kumar

मैं आईने से डरती हूँ

मैं आईने से डरती हूँ

2 mins
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ज़िंदा रहने की ज़द्दो-ज़हत में 

जाने कितने अरमान अपने 

खुद अपने, पैरो तले कुचलती हूँ मैं,

रौंद अपनी ख्वाइशों को रोज़ 

किसी और की ज़रूरते पूरी करती हूँ मैं 

सफर-ए-ज़िन्दगी में यूँ ही 

बस आगे बढ़ती जाती हूँ मैं ।


जाने कितने गांव, कितने शहर बदले 

जाने कितने रूप बदले हैं 

कितने चेहरे बदले, मुखौटे पहने 

कि, अब तो आईने में भी 

खुद को पहचान नहीं पाती हूँ 

आईने में खुद को, तलाश न पाती हूँ 

मैं आईने से डरती हूँ ।


अक्सर आईने में मुझे,

अब, रूह अपनी दिखती है,

पर कुछ घायल सी

हर वक़्त वो लगती है,

टूटे ख्वाबों के चोट 

दिखते हैं माथे पर 

हर बदले रूप का दाग 

स्पष्ट है चेहरे पर ।


वक़्त के ठोकरों से बने चोट,

फैले हैं पुरे बदन पर, और 

अपनों के धोखे सभी

नासूर हैं दिल पर,

ज़िन्दगी के दिए घाव सभी,

हरे, गहरे हैं सीने पर

आईना भी शर्मिंदा है आज, 

अपने पारदर्शी होने पर ।


आँखे फिर भी मुस्कुरा रही हैं 

मानो मुझसे ये कह रही हैं 

तू लड़ती रह, हर चोट सह 

आगे तू बढ़ती रह,

मंज़िल ढूंढ अपनी, फिर 

उसका रास्ता खुद ही बना,

हराकर सब मुश्किलों को 

तू आगे बढ़ती रह । 


मैं हूँ यहाँ, तेरे ही भीतर 

मैं अंत तक रहूंगी तेरे साथ,

जब तक ये शरीर है

मैं हारूंगी नहीं, 

बस, तू हार मत मानना 

वक़्त की बेरुखी, और 

समाज की नृशंता देख 

तू समझौता मत करना ।


जब आईने में देखती हूँ खुद को 

अपनी रूह को मैं 

ऐसे जड़-जड़ सा पाती हूँ,

देख हालत इसकी

रूह तक, मैं काँप उठती हूँ,

कोई रास्ता ढूंढ नहीं पाती 

खुद से ही मैं डर जाती हूँ,

मैं आईने से डर जाती हूँ ।


जब भी अपने वज़ूद को 

ऐसा, धुंदला सा पाती हूँ 

आईने में, इन मुस्कुराती आखों से 

बहता लहु देख पाती हूँ 

आईने के सामने, खुद को ही देख 

मैं अकेले में, रो उठती हूँ,

यही वजह है, कि अब 

मैं आईने से डरती हूँ।


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