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Shah Talib Ahmed

Others

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Shah Talib Ahmed

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माँ की ममता

माँ की ममता

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मेरी हरारत को भी वो बुखार समझती है।

ज़रा सी आवाज़ तेज़ हो जाये तो वो खार समझती है।


मैं कितनी भी तमीज़ से पेश आऊँ वो सब बेकार समझती है।

जब तक उनके रुख़सारों को ना चूमो कहाँ वो प्यार समझती है।


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