कवित्त छंद (प्रकृति सृजन)
कवित्त छंद (प्रकृति सृजन)
1 min
169
सूर्य नित चढ़े ढले, नीले नद- ताल मिले,
बागीचों में फूल खिलें, ज़िंदगी निहाल है।
पक्षियों के गीत सुने, नूर प्रकृति ही बुने।
प्रेम-प्रीत पुष्प चुने, खूब खुश हाल है।
झिलमिल सितारे ये, रिमझिम फुहारें ये।
अतुलित नजा़रे ये, हरि के कमाल हैं।
सूखी नहीं धरा मिले, बागीचों में फूल खिलें।
ख़्वाब सुहृदय पलें...आस बेमिसाल है।
