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Dr.Pratik Prabhakar

Others

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Dr.Pratik Prabhakar

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हम निडर

हम निडर

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न काम का, न आराम का

है बस नाम का, ये शहर।

चलते सभी, न रुकते कभी

सांस तो ले ले, कोई ठहर।।


है भेड़ चाल, न कोई ढाल

दौड़ते रोज, ढाते कहर।

न ही मन है, न उपवन है

इस तन को पिलाते जहर।।


निकले कोई,आकांक्षा सोई

आंखे ढूंढे बस सही है पहर।

बाहर के कोई, आँखे हैं रोई

निकले कैसे, लगता है दर।।


चल इंसान, बना पहचान

तू बस ठान, बन जा निडर।

मैं साथ,बस रख जज़्बात

शुरू करें अनजान सफर।।



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