हम और समाज
हम और समाज
हर प्राणी है सदा चाहता, सबसे सर्वदा उसको मिलता रहे प्यार,
बोना होगा बीज उसका ही, तभी मिलेगी फसल जिसकी है दरकार।
दुनिया एक कुएँ जैसी है, ध्वनि जैसी ही मिलेगी प्रतिध्वनि,
यदि अपवाद छोड़ हम देवें, दुष्ट दुष्ट को और मुनी को मुनि।
समाज सदा से ऐसा ही रहा है, इसमें होता है शनै:-शनै: परिवर्तन,
भले- बुरे तो सदा रहे हैं-सदा रहेंगे, हमको यहां करना है अनुकूलन।
प्यार में तो प्रचण्ड शक्ति है, इसमें आकर्षण है बड़ा अपार,
लोभ मुक्त पर त्याग भावमय, होता है हर एक सच्चा प्यार।
पहले खुद से प्यार करें हम, दूसरे नंबर पर हमारा अपना परिवार,
पर समाज है इन सबसे ज्यादा, हमारा अपना एक वृहत परिवार।
