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shahab uddin

Others

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shahab uddin

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

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है गिरां गरचे मगर काम ये करना होगा

तुम को मिलने में हमें खु़द से बिछड़ना होगा


तुझ में अफलास की बू ही न कहीं आ जाए

हम से मिलने को तुझे और संवरना होगा


पढ़ते आए हैं शबो रोज़ ही रुतबे तेरे

तेरी आंखों को हमें और भी पढ़ना होगा


पारसा रह के नहीं काम है चलने वाला

सच को इस दौर में चेहरा तो बदलना होगा


दिल है बेजा़र उसे ढूंढ रही हैं आंखें

अब मसीहा को ज़मीं पर ही उतरना होगा


शाह तदबीरे मुहब्बत है ज़मीं का ज़ेवर

उस्वे दस्तार में इसको ही तो जड़ना होगा।


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