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Arti jha

Others

4.7  

Arti jha

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

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मैंने खोला जो दर अजनबी के लिए।

वो गया ही नहीं फिर सदी के लिए।।


बात अम्मा बताती रही ये सदा,

आंख रखना खुली हर किसी के लिए।।


प्यार में शर्त रखते वही लोग हैं,

प्यार करते हैं जो दिल्लगी के लिए।।


आजकल का चलन ये अजब हो गया,

आदमी खेल है, आदमी के लिए।।


प्रेम इससे बड़ा और क्या हो भला,

देखा सागर को मुड़ते नदी के लिए।।


होश आते ही बेचैनियाँ बढ़ गईं

कुछ पिला दो मुझे बेख़ुदी के लिए।।


ढूंढते सब चकाचौंध की जिंदगी,

कौन मरता है अब सादगी के लिए।।


खो गया क्या मेरा, इल्म है ये मुझे,

हूँ मगर चुप किसी की खुशी के लिए।।



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