एक परी
एक परी
निकले हैं पंख कल्पना के,
मैं उड़ता दूर गगन में हूँ।
एक परी उतरकर नज़रों में,
दिल मेरा रोज़ चुराती है।।
इन दिनों समंदर में गहरे,
इच्छाएं गोते खाती हैं।
लाती हैं मोती माणक चुन,
धनवान बनी इठलाती हैं।।
मैं लिपटा सजधज में रहता,
दरबारे शाही में नृप सा।
और खड़ी बगल में प्यारी सी,
एक दासी चंवर ढुलाती है।।
निकले हैं पंख कल्पना के,
मैं उड़ता दूर गगन में हूँ।
एक परी उतरकर नजरों में ,
दिल मेरा रोज़ चुराती है।।
जब झूला बनकर आरजूएं,
बाहों में मुझे झुलाती हैं।
अभिलाषाएं तब रगरग में ,
मुझको भी साथ बहाती हैं।।
मैं सुधबुध खोया सा अचेत,
सुख के बिस्तर पर होता हूँ।
ख्वाबों में कभी टहलता हूँ ,
और कभी नींद लग जाती है।।
निकले हैं पंख कल्पना के,
मैं उड़ता दूर गगन में हूँ।
एक परी उतार पर नज़रों में ,
दिल मेरा रोज़ चुराती है ।।
उठता है ज्वार समुंदर में ,
मन का तट तोड़ निकलता है।
कोमल कलिका का चंचलपन ,
जब रंग "अनन्त"बदलता है।।
हो जाती क्रूर तमन्नाएं ,
जख़्मी दिल को कर देती है।
क्वारेपन की गंगा मेरी ,
मुंह मेरा बहुत चिढाती है।।
निकले हैं पंख कल्पना के,
मैं उड़ता दूर गगन में हूँ।
एक परी उतर कर नज़रों में,
दिल मेरा रोज़ चुराती है ।।
