एक मुहब्बत बरगद सी
एक मुहब्बत बरगद सी
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रहता है ज्यों का त्यों ही
और छाँव देता बरगद
इतना विशालकाय भी
जड़त्वीय है बरगद
और बरगदो के जैसी
है माँ बाप की कवायद
वो ढाल हैं हमारी
शाफ़ी है वो मुहब्बत ।
कितने ही प्रेम रस में
पाला गया है हमको
अदब सी ही सरस में
ढाला गया है हमको
जब जब घटा गलत कुछ
या हमने खतायें की हैं
हर बार तसल्ली से
सँभाला गया है हमको।
हर बार निकाला है
हमको मुसीबतो से
झेली हंसी खुशी है
उन दोनों ने क़यामत
बस दूर हूँ अभी मैं
पर कम नहीं है चाहत
वो ढाल हैं हमारी
शाफ़ी है वो मुहब्बत
माँ बाप की मुहब्बत
माँ बाप की मुहब्बत ।
