दूरियाँ बढ़ती गई
दूरियाँ बढ़ती गई
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जीवन के पथ पर
मिलते हैं लोग अनेक
कुछ की रह जाती हैं
धुँधली सी याद
स्मृति पट पर।
परन्तु वह तो मेरी हमदम थी
वह मेरी बचपन की सखी थी
बीता था बचपन प्यारा
संग उसी के
हमेशा अपने सुख -दुःख में
पाया था अपने समीप उसे
कभी न मिलूँ उससे तो
पाया खुद को संसार से विरक्त
परन्तु अब आलम बदल गया
उसकी राह मुझसे जुदा हो गयी
वह अग्रसर थी
अपनी मंज़िल की ओर
में खुश थी उसे देख
परन्तु वह व्यस्त होती गई
मैं अकेली होती गयी
और दूरियाँ बढ़ती गई
