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दो पल की उम्मीदें

दो पल की उम्मीदें

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दिल की इस ज़मीन पर खिलता कुछ नहीं

करले सौदा तू यहाँ मिलता कुछ नहीं 

दो पल की उम्मीदों पे ठहरता है ज़माना 

फिर है वही समां किस्सा यह है वही पुराना 

हिलती नहीं क़िस्मत की लकीर

सुनती नही ज़िंदगी कुछ तेरी 

क्यूँ हर दुआ अब है बेअसर 

क्यूँ वक़्त भी अब है बेसब्र 


कैसी यह कमी है मिटती जो नहीं

दिल को मंज़ूर है अब जो मिले वो सही 

दो पल की उम्मीदों पे ठहरता है ज़माना 

फिर है वही समां किस्सा यह है वही पुराना 

मिलती नही सबको मंज़िल

ख़्वाबों के हैं यहाँ सभी क़ातिल

क्यूँ हर दुआ अब है बेअसर 

क्यूँ वक़्त भी अब है बेसब्र


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