STORYMIRROR

Ishan Ahmad

Others

4  

Ishan Ahmad

Others

बसंत

बसंत

1 min
308

पीपल की कोंपल निकल रही हैं 

टेसू भी मुस्काया है 

गेहूँ की बाली गाभिन है 

यूँ आकर बसंत मदमाया है 


लगाओ गुलाल और 

खेलो होली 

प्रकृति का संदेशा आया है 

वृक्षों ने गिराकर पत्ता पत्ता 


फ़िर से जीवन पाया है 

पवन में महक है फूलों की 

रवि मुँह धोकर आया है 

जिधर भी देखो आशाएँ हैं 


उम्मी दों का मौसम आया है 

चिड़ियाँ और भँवरों ने मिलकर 

गीत प्रेम का गाया है 

परदेसी पक्षी ले रहे विदाई 


मौसम विवाहों का आया है 

कभी बसंत है कभी है सावन

आयीं पूस की लंबी रातें 

ज्येष्ठ के लंबे तप्ते से दिन 


इस तरह प्रकृति ने हर मौसम का 

मज़ा हमें चखाया है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन