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Ishan Ahmad

Others

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Ishan Ahmad

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

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हक़ीक़त से जब बेख़बर हो गई।

ये दुनिया इधर से उधर हो गई।।


नहीं पूछता अब कोई हाले दिल।

ये बस्ती भी अपनी नगर हो गई।।


कोई नज़रे बद से नहीं देखता।

मेरी बेटी जबसे निडर हो गई।।


ये पछुआ हवा क्या चली देश में।

बुज़ुर्गी मेरी बेअसर हो गई।।।


मैं तकता हूँ तारे सनम रात भर।

ख़फ़ा जबसे तेरी नज़र हो गई।।


गिला क्या करें अब कोई आपसे।

यूँ ही ज़िन्दगी जब बसर हो गई।।


थी ईशान दुनिया ये जन्नत मेरी।

इसे ही किसी की नज़र हो गई।।




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