"बदल गई हूँ मैं"
"बदल गई हूँ मैं"
जो बचपन में बात बात पर
आँसुओं की धाराएँ बहाती थी...!
जो बात बात पर झगड़ने लगती थी...!!
अब मैं वह नहीं... जो बात बात
पर जोर जोर से हँसती थी...!!!
अब मैं वह नहीं... जो बात बात पर
नाराज हुआ करती थी...!!!!
हाँ... बदल गई हूँ मैं...!
हाँ... खुश रहने लगी हूँ मैं...!!
जो रात दिन विक्रम और बेताल
के सवालों में उलझी रहती थी...!
जो नई- नई किताबों की खुशबू में
प्रेमचंदजी और निरालाजी की
रचनाओं में खोई रहती थी...!!
अब मैं वह नहीं... जो कलम के
खो जाने पर निराश हो जाया करता थी...!!!
अब मैं वह नहीं... जो कागज के
टुकड़े- टुकड़े कर के फिर से जोड़ा करती थी...!!!!
हाँ... बदल गई हूँ मैं...!
हाँ... खुश रहने लगी हूँ मैं...!!
जो एक बार में ही गुरु के
कह देने पर सारें प्रश्नों को रट लिया करती थी...!
जो बिन मतलब की लड़ाई करती थी...!!
अब मैं वह नहीं... जो बारिश में भी भीगकर
पाठशाला जाया करती थी...!!!
अब मैं वह नहीं... जो पेड़ों कि छाया में ही
अपने कदमों को रखती थी...!!!!
हाँ... बदल गई हूँ मैं...!!
हाँ... खुश रहने लगी हूँ मैं...!!
जो रातों के अंधेरों में छलांग
मार कर चाँद को भी हिला दिया करती थी...!
जो बादलों को भी पेंसिल
कि धार से धरती पर उतार दिया करती थी...!!
अब मैं वह नहीं... जो एक गाँव को
एक छोटी सी पाटी पर बसाया करती थी...!!!
अब मैं वह नहीं... जो अपनी आँखों में
समंदर को भी जगह दिया करती थी...!!!!
हाँ... बदल गई हूँ मैं...
हाँ... खुश रहने लगी हूँ मैं...
